पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१४५

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राबिन्सन क्रूसो ।


फैल जाय तो दिशा का भी ज्ञान न कर सकूँगा। भाग्यक्रम से दो-पहर पीछे प्रतिकूल वायु बहने लगी। मैंने पाल गिरा दिया। कुछ दूर जा कर देखा कि स्रोत भी उलटा बह रहा है वह उसी भँवर का परवर्तित स्रोत था। मैंने बड़ी खुशी से उस सोते में नाव छोड़ दी। जिन लोगों ने फाँसी की तख्ती पर खड़े होकर मुक्ति-संवाद सुना होगा या जो बधिक के हाथ की चमचमाती हुई नंगी तलवार के वार से बच गये होंगे वही मेरे उस समय के आनन्द का अनुभव कर सकेंगे। वही समझेगे कि उस समय मुझे कितना हर्ष हुआ होगा।

भँवर के वेग में पड़ कर मैं द्वीप के जिस ओर से रवाना हुआ था, फिरती बार उसकी दूसरी ओर जा पड़ा। अन्दाज़न पाँच बजे दिन को मैंने बड़े कष्ट से नाव को खे कर किनारे लगाया।

मैंने ज़मीन में पाँव रखते ही सब से पहले घुटने टेक कर अपने प्राणत्राण के निमित्त परमेश्वर को धन्यवाद दिया। मैंने अब निश्चय किया कि मुझको इसी टापू में रहना होगा, यही ईश्वर को मंजूर है; किन्तु मैं उसको न मान कर अन्यत्र जाने की चेष्टा करता हूँ तो भी वे मेरे इस विरुद्धाचरण को बार बार क्षमा करते हैं। इस कारण, उनसे बढ़ कर दयालु कौन होगा! मैं ऐसा थका था कि पेड़ के नीचे लेटते ही सो गया।

जब मैं जागा तब मन में यह भावना हुई कि किस रास्ते से घर लौट चलना चाहिए? जिस रास्ते से आया हूँ उसी रास्ते से? उस रास्ते से जाने का तो साहस नहीं होता। जिस राह से पाया हूँ उसके विपरीत मार्ग से? कौन जाने, उस ओर