पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१४७

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राबिन्सन क्रूसो ।

१३। राबिन्सन से । खुल गई। उस समय जो मेरे मन में भय हुआ वह कह कर कैसे समझा ? इस मानवशून्य द्वीप में मेरा नाम ले कर कौन पुकारता है ? आँखें मल कर चारों ओर ध्यान से देखते ही मेरा भ्रम जाता रहा । मैंने देखा, घेरे के मेरा ऊपर पाला हुआ आत्माराम नामक सुग्गा बैठ कर मेरी ही सिखाई बोली बोल रहा है । तब मेरा भय दूर हुआ सहीपरन्तु मुझे यह सोच कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आत्माराम पींजरे से क्योंकर निकल आया। यदि पींजरे से निकल ही आया तो ठीक उसी जगह श्र कर क्यों बैठा १ मैंने इस पर विशेष तर्कवितर्क न कर के हाथ बढ़ा कर उसका नाम ले कर पुकारा । पुकारते ही वह फ़ौरन वहाँ से उड़ कर मेरे हाथ पर आ बैठा और बोलने लगा ‘राबिनराबिन, राबिन क्रूले, तू इतने दिन कहाँ था १ फिर कहाँ आया १७ मैं उसको ले कर अपने घर आया। इस समय डोंगी के लिए मेरा मन ललचाने लगा । आहा, यदि उसे इस ओर ला सकता तो कैसा अच्छा होता ! किन्तु लाता कैसे १ पूरब ओर घूम कर १ नहीं बाप रे ! इस बात की भावना करते ही मेरे हृदय का उषण शोणित शीतल हो उठता है । अच्छा उस ओर से नहीं तो पश्चिम ओर से १ कैन जाने उस ओर क्या है ? इस प्रकार सोच विचार कर मैंने नाव की आशा छोड़ दी । यद्यपि उसके बनाने में बहुत परिश्रम हुआ था, और उसके पानी में उतार ले जाने में और भी अधिक कष्ट उठाना पड़ा था तथापि प्राण के आगे ते उसका कुछ मोल नहीं प्राण से बढ़ कर तो वह प्रिय न थी ।