पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१६५

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राबिन्सन क्रूसो ।

१४ राबिन्सन क्रसे। चित्त में बनी रहती थी । मैं कभी कभी स्वप्न भी देखा करता था कि उन राक्षसों को मार रहा हूं। इस काम पर मैं यहाँ तक मारूढ़ हुआ कि अपने को अच्छी तरह छिपाने योग्य एक गुप्त स्थान की खोज में घूमने लगा। मैंने पहाड़ की तराई में एक ऐसी जज गह ढूंढ़ निकाली जहाँ छिप कर राक्षसों की नौका देख सर्दी और जहूल म में कई एफ ऐसी जगहें ठीक कर रक्खीं जहाँ पेड़ की आड़ में छिप कर उन पर एकाएक गोली बरसा सख् । इस विचार को पक्का करके मैं रोज़ सबेरे दो तीन बन्दूकों में और पिस्तैौल में गोली भर कर उस पहाड़ के ऊपर जाता और देखता कि उन राक्षस की नौका आती है या नहीं । वह जगह मेरे किले से तीन मील पर थी । सिर्फ़ इतनी ही दूर मैं प्रतिदिन जाताआता था । पर मैंने किसी दिन किसी को देखा नहीं। दूरबीन लगा कर भी सारे समुद्र में देखता भालता, पर कहीं कोई नाघ का चिह्मात्र भी दिखाई नहीं देता था। जब तक उत्साह था तब तक मुझे अकारण बीसबाईस मनुष्यों को मारने को इच्छा अत्यन्त प्रबल थी । किन्तु उन लोगों को कहीं न देख कर जब मेरा उत्साह घट गया जब तमोगुण की मात्र कुछ कम हुई—ब शान्त चित्त से सेच कर मैंने देखा कि उन बेचारों का दोष क्या था जो मैं इतने दिनों से उनकैो मारने पर उद्यत था । मांस मनुष्य का खाना उनके देश का रिवाज है । उन लोगों ने कभी अच्छी शिक्षा नहीं पाई है, केवल अपनी प्रकृति की उत्तेजना से जो उनके ज में आता है, करते हैं । उन लोगों के गुणदोष जी की विवेचना करने का मुझे क्या अधिकार है ? उन लोगों ने