पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२३

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राबिन्सन क्रूसो ।


विघ्न-स्वरूप हो रहा था । मैं जहाँ जाता था वहीं सब लोग शिष्ट जान कर मेरा आदर करते थे ।

कप्तान के उपदेशानुसार मैं कई रुपयों के अच्छे अच्छे खिलौने और अन्याय चटकीली भड़कीली कम दाम की चीजें लेकर गिनी शहर के गया । वहाँ अच्छा मुनाफ़ा हुआ । वहाँ से अन्दाज़न पौने तीन सेर सोने की गर्दा लाकर लन्दन में बेंच कर मैंने कोई साढ़े चार हज़ार रुपये कमाये । यही सफलता मेरे वाणिज्य और विदेश-भ्रमण के प्रलोभन का विशेष कारण हुई ।

मेरे जीवन में यही एकमात्र सामुद्रिक यात्रा कितने ही अंशों में निर्विघ्न हुई थी । किन्तु दुर्भाग्य तो मेरे साथ ही था । मैं आफ्रिका के दुःसह ग्रीष्म ताप से यद्यपि अस्वस्थ हो गया था तथापि यह यात्रा मेरे लिए लाभमूलक ही रही । धन कमाने के अतिरिक्त मैंने नौका-संचालन के विषय में कितने ही तत्व भी स्थूलरूप से सीख लिये थे । यह सब मेरे मित्र कप्तान की दया का ही फल था । मुझ को कुछ सिखलाते समय वे बहुत प्रसन्न होते थे , और मैं भी सीखते समय विशेष आनन्द पाता था । सारांश यह कि इस दफ़े मैं नाविक और वणिक दोनों हो कर लौटा ।

मैं गिनी देश का एक व्यवसायी हो गया, किन्तु मेरे दुर्भाग्यदोष से मेरे कप्तान मित्र की शीघ्र ही मृत्यु हो गई । तब उस जहाज़ का मेट कप्तान हुआ । मैं उसके साथ यत्किंचित मूल धन लेकर गिनी को रवाना हुआ । और रुपया अपने मित्र की स्त्री के पास बतौर धरोहर के रख गया ।