पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२३४

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क्रूसे के उद्धार को पूर्व सूचना। २१३ आत्मसमर्पण करने को कहा। उन लोगों ने भी झट अन त्याग कर के प्राणभिक्षा चाही। कप्तान ने कहा-"तुम लोगों का प्राण लेना या न लेना हमारे सेना गति की इच्छा के अधीन है ।: ' हम लोगों ने उनके हाथपैर बाँध कर अपने कब्जे में कर लिया । अब हम लोगों को नाव की मरम्मत करके जहाज़ पर आक्रमण करना बाक़ो रहा । मेरे मन में आशा होने लगी कि अब मेरे उद्धार का समय समीप है । मैंने दूर से कप्तान को पुकारा । एक आदमी ने जाकर कहा, ‘कन्तान साहब, सकर आप को बुलाते हैं ” कप्तान ने झट उतर दियातुम हुजूर से जा का कह दो कि वह अभी हाज़िर होता है ।’ यह उन कर सभी नाविक चुप हो रहे किसी को ज़ोर से बोलने का साहस नहीं हुआ । उन लोगों ने समझा कि इस द्वीप के स्वामी अपना दलबल ले कर समीप ही कहीं ठहरे हैं। कप्तान को मेरे पास आने का उपक्रम करते देख कर उन लोगों ने कहा-‘हम लोगों से बड़ी ग़लती हुई, अ वे ऐसा काम कभी न करेंगे । आप अपने सेनापति से हम लोगों पर दया करने को कहिये ।’ कप्तान ने कहा-‘मेरे सेनापति बड़े दयालु हैं, इसी से उन्होंने अब तक तुम लोगों को पेड़ से लटका कर फाँसी नहीं दी । वे तुम लोगों को किसी प्रकार का क्लश न देंगे। तुम लोगों को गड ले जायेंगे, वहाँ क़ानून के अनुसार जो उचित दण्ड होगा दिया जायगा ।’ वे लोग जानते थे कि आईन के अनुसार इस अपराध का दण्ड फाँसी है। इसलिए उन लोगों ने बिनती कर के कहा -“तो हम लोगों को इसी द्वीप में छोड़ दीजिए, गलैंड न ले जाइए ” कप्तान ने कहा ये बातें सेनापति की इच्छा पर निर्भर हैं।