पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२४४

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क्रूसो का स्वदेशप्रत्यागमन और धनलाभ । २२१ ! अन्त में उनके शपथ करने पर कप्तान ने उन दोनों को जहाज़ पर चढ़ा लिया । जहाज़ पर चढ़ा कर उन्हें अच्छी तरह डाँटडपट बता दी । तब से ये दोनों बड़ी भलमनसाहत के साथ रहने लगे। में अपनी चमड़े की टोपी, छत्ता, और तोता अपने साथ जहाज़ में लाया था। मेरे पास जो कुछ रुपये थे उन का लना भी मैं न भूला । इतने दिन में ही बेकार पड़े रहने के कारण स्पर्घा में मोच लग गया था । देखने से कोई यह न कहता कि यह चाँदी का रुपया है । मैंने उनको आन ब्छी तरह मल कर झलका लिया । इस प्रकार अनेक सुखदुःख भोग कर १६८६ ईसवी की ६४ वर्ष दिसम्बर को मैंने द्वीप छोड़ा। ठीक इसी तारीख को मैं शैली के मूर का दासत्व छोड़ कर बजरे के सहारे भागा था । इस द्वीप में अट्ठाईस वर्ष दो महीने उन्नीस दिन एकान्तवास करने पर आज मेरा उद्धार हुआ। आज मैं अपने देश को जा रहा हूँ, आज मेरे आनन्द का वारापार नहीं । धन्य जगदीश्वर ! तुम्हारी कृपा से आज इस आशा तीत सुख का भागी बना हूं । क्रसेका स्वदेश-प्रत्यागमन और धनलाभ मुद्दत के बाद १६८७ ईसवी की ग्यारहवीं जून को मैं हूँग - लैंड लौट आया । आज पैंतीस वर्ष के बाद मुझे स्वदेशदर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । देश लौटकर देखा, मैं यहाँ सम्पूर्ण रूप से औपरिचित हो गया हूं। मेरे उपकारी मित्र कप्तान की ली, जिसके पास मेरा