पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२४५

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राबिन्सन क्रूसो ।

२२२ राबिन्सन ले। कुछ रुपया जमा था वहअब तक जीती थी, किन्तु विधवा हो जाने के कारण वह बड़ी दण्द्रिा हो गई थी । मैंने अपना धन उससे नहीं माँगा बल्कि उस समय मेरे पास जो कुछ पूंजी थी उसमें से भी उसे कुछ देकर उसकी सहायता की। मैं कप्तान का उपकार और सदय व्यवहार न कभी भूला और न कभी भूलेंगा। मैं लन्दन से यार्क शहर को गया । वहाँ जाकर क्या देखा। —मेरे पिता, माता, और भाई सब मर गये, केवल मेरी दो बहनें और दो भतीजे बच रहे थे । घरवालों ने समझ लिया कि मैं विदेश में जाकर मर गया, इस से मेरे पिता मुझके पैतृक धन का कुछ भी अंश न दे गये। पैतृक धन से हाथ धोकर मुझे अब स्वावलम्बन से जीवननिर्वाह करना होगा। परन्तु मेरे पास जो कुछ पूंजी थी उससे आश्रम का ख़र्च चलना कठिन था। जहाँ से कुछ मिलने की आशा न थी वहीं से मुझे कुछ साहाय्य मिला । विद्रोही नाविकगण जिस कप्तान को मारने के लिए मेरे टापू में ले गये थे उसने देश में आकर मेरी बात लेागों से कही, और मैंने जिस युक्ति से विद्रोहियों के हाथ से जहाज़ ले लिया था वह हाल भी उसने जहाज के मालिक से कहा । मैंने जिन महाजनों के जहाज़ और माल की रक्षा की थी उन्होंने मुझे लगभग तीन हज़ार रुपया पुरस्कार मिलकर दिया । यह रुपया भी मुझे निश्चिन्त होकर बैठने और अन्य केई व्यवसाय न करके जीवननिर्वाह के लिए यथेष्ट न था। इसलिए मैंने सोचा कि लिसबन जाकर मंजिल में जो मेरी खेती आदि होती थी उसकी हालत का पता लगाऊँ । मैं अगले साल के एप्रिल महीने में जहाज़ पर सवार होकर लिसबन जा