पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२७

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राबिन्सन क्रूसो ।

एक दिन बहुत सवेरे जब हम लोग मछली पकड़ने चले तब ऐसा गाढ़ा कुहरा पड़ा कि किनारे से आध मील दूर जाते जाते किनारा अदृश्य हो गया । हम लोग किस तरफ़ कहाँ जा रहे हैं, यह कुछ न समझ पड़ा । सारे दिन और सारी रात हम लोग बराबर नाव खेते रहे । जब प्रभात हुआ तब देखा कि हम लोग किनारे की ओर न जाकर किनारे से दो तीन मील दूर समुद्र की ही ओर चले गये हैं । निदान हम लोग बहुत परिश्रम और संकटों को झेलते हुए राम राम करके किनारे पर पहुँचे । किन्तु कठिन परिश्रम और दिन-रात के उपवास से हम लोग राक्षस की भाँति भूख से व्याकुल हो गये थे ।

हमारे स्वामी ने इस यात्रा में शिक्षा पाकर भविष्य में विशेष रूप से सावधान होने का संकल्प किया । उन्होंने प्रतिज्ञा की कि अब कभी दिग्दर्शक कंपास और भोजन की सामग्री साथ लिये बिना मछली पकड़ने न जायेंगे । वे हम लोगों के गिनी जानेवाले जहाज़ की एक लम्बी सी डोंगी पकड़ लाये थे । उन्होंने उस डोंगी के आगे पीछे मल्लाह के खेने की जगह छोड़ कर उसके बीच में एक छोटा सा घर बनाने के लिए अपने मिस्त्री के हुक्म दिया । उनका मिस्त्री भी एक बन्दी अँगरेज़ युवक था । उसने मालिक की आज्ञा पाते ही एक कमरा और उसके भीतर खाने पीने की वस्तुएँ तथा कपड़ा आदि रखने के लिए आलमारी इत्यादि बना कर एक अच्छा कमरा तैयार कर दिया ।

हम लोग अक्सर उसी डोंगी को लेकर मछली पकड़ने जाते थे । मछली पकड़ने में मैं सिद्धहस्त था, इसलिए कभी ऐसा न होता कि मेरे स्वामी मुझको अपने साथ न ले जायें ।