पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२८७

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राबिन्सन क्रूसो।


बिछौने पर जा कर लेट रही, लेटते ही नींद आ गई। तीन घंटे के बाद नींद टूटने पर कुछ श्राराम मालूम हुआ। फिर सोने की चेष्टा की, पर नींद न आई। पाँच बजे सबेरे तक जागती रही, तब बड़ी कमज़ोरी और क्लान्ति मालूम होने लगी। दूसरे दिन भी पहले तो बड़ी भूख लगी फिर उबकाई आने लगी। रात में सिर्फ थोड़ा सा पानी पीकर सो रही। नींद आने पर सपने में देखा कि मैं एक बाज़ार में गई हूँ। बाज़ार के दोनों ओर अनेक प्रकार के पकवानों की दूकानें लगी हैं। मैंने भाँति भाँति की खाने की चीज़ ख़रीद कर स्वामिनी को दी और मैंने भी पेट भर खाया। इसके बाद मेरा पेट खूब भरा हुआ सा मालूम होने लगा जैसे दूसरे के घर से भोज खाकर आई हूँ। जागने पर मैंने देखा कि मैं एकदम विह्वल हो गई हूँ। मैंने थोड़ा सा चीनी का शरबत बना कर पिया। रात में कितना ही भला-बुरा सपना देख कर जब सबेरे जाग उठी तब भूख से मेरे पेट में आग सी लग रही थी। राक्षसी क्षुधा ने मुझे बेहाल कर दिया था। मेरी गोद में यदि बच्चा होता तो उस समय उसे कच्चा ही खा डालती, ऐसी दुर्जय दुर्निवार क्षुधा व्याप रही थी। भूख के मारे मैं एकदम उन्मादिनी हो उठी। ऐसी उन्मादिनी कि गारद में रखने योग्य। मैं पागलपन करते करते, खाट के पाये पर गिर पड़ी जिससे नाक में बड़ी चोट लगी, नाक से खून गिरने लगा। कुछ लोहू बाहर निकल जाने से मुझे कुछ चैतन्य हो आया और फिर उबकाई आने लगी पर क़ै न हुई। होती क्या? जब कुछ पेट में रहे तब तो! कुछ देर के बाद मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। सभी ने समझा, मैं मर गई। मेरे पेट में एक अनिर्वचनीय यन्त्रणा होने लगी। अँतड़ियाँ ऐठने लगीं।