पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२८९

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राबिन्सन क्रूसो

२६६ राबिन्सन क्रस । लोलुपदृष्टि से चारों ओर ढूंढ़ने लगी । यदि मेरी स्वामिनी उस समय मर गई होतीं तो मैं उनका मांस नोच कर खाये बिना न रहती । उन पर मेरा असीम अनुराग था, इसीसे मैं रुक रही, नहीं तो उन्हें जीवित अवस्था ही में नोच खाती । दो-एक बार मैंने अपने ही स्खे हाथ का मांस दाँत से नोच कर खाने की चेष्टा की । उसी समय मेरी दृष्टि एकाएक उस लोहू पर जा पड़ी जो कल मेरी नाक से गिर कर जम गया था। मैं उसी घड़ी बड़ी आतुरता के साथ उसे मुंह में डाल कर जल्दी जल्दी निगलने लगी । मुझे इस बात का भय होने लगा कि शायद कोई देख ले तो कहीं छीन कर न ले जाय । उसके खाने से क्षुधा किश्चित् शान्त हुई । थोड़ा सा पानी पीकर मैं कुछ देर के लिए स्थिर होगई । क्रमशः निराहार अवस्था में तीन दिन बीत गयेचौथा दिन आयातब भी कुछ खाने को न मिला रात में फिर वैसी ही भूख लगी, पेट में ज्वाला, वमन, तन्द्रा, उन्माद और बेहोशी मालूम होने लगी । मैं बहुत कम्प, देर तक रोई । फिर यह सच कर, कि अब मरने ही में कुशल है, ज्यों त्यों कर पड़ रही । ‘सारी रात बेचैनी में कटी । एक बार भी नींद न आई । बुधा के मारे पाकस्थलो में बड़ी कठिन यन्त्रणा होने लगी । सबेरे मेरे नवयुवक सर्कर ने खूब ज़ोर से मुझे पुकार कर कहा-‘सुसान, सुसान ! देखोदेखोमेरी माँ मर रही है । मैंने ज़रा सिर उठा कर देखा, वह तब तक मरी न थी, पर उसके जीने का भी कोई लक्षण न था । ‘मैं उदर की यन्त्रणा से न उठ सकी । इसी समय सब लोग चिल्लां ठे'जहाज़ जहाज़ !' तब सभी लोग मारे खुशी के शोरगुल मचाते हुए उछलनेकूदने लगे। में पड़ी