पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३६०

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मदागास्कार टापू में हत्याकाण्ड।


फिर जलते हुए घर के भीतर ही घुसने लगे। वे लोग उन नर-पिशाचों के तेज़ बरछे की चोट की अपेक्षा धधकती हुई श्राग का आलिङ्गन अच्छा समझते थे। जहाज़ के माँझी लोग घर के द्वार पर खड़े हो, प्राणभय से भीत, नर-नारियों को बरछे की नोक से बींध कर जलते हुए घर के भीतर लौटा देते थे। जो नहीं लौटते थे उन्हें तलवार से टुकड़े टुकड़े कर के आग में फेंक देते थे। किसीके अङ्ग-प्रत्यङ्ग में बरछी भोक कर बड़ी निर्दयता के साथ मारते थे। जहाँ बहुत लोगों को एक स्थान में जमा देखते थे वहाँ बम का गोला फेंक कर सभीको चौपट कर अपनी शैतानी का अन्त कर दिखलाते थे।

माँझियों ने अब तक एक भी बन्दूक की आवाज न की थी, कारण यह कि बन्दूक का शब्द सुन कर बहुत लोग जाग उठते। किन्तु थोड़ी ही देर में चारों ओर आग फैल गई। तब सभी जाग गये। फूस का घर झटपट जल कर भस्म होने लगा। आग के दाह से नाविकों को मार्ग में खड़ा होना कठिन हो गया। तब वे भी आग के साथ साथ आगे बढ़ने लगे। वे नाविक रास्ते में जिसको पाते उसीको आग में ढकेल देते थे या उसे तलवार से टुकड़े टुकड़े कर डालते थे। अब वे लोग धड़ाधड़ बन्दूक़ें भी चलाने लगे।

मैं नाव पर से यह भीषण अग्नि-प्रसार देख कर डर गया। जहाज़ का कप्तान सो गया था। माँझियों ने जाकर उसे जगाया। वह आँख मलता हुआ उठा और उठते ही एकाएक इतनी बड़ी अग्निज्वाला देख कर और बन्दूक़ों की आवाज़ सुन कर मेरे लिए उद्विग्न हो उठा। यद्यपि उसके पास थोड़े से नाविक रह गये थे तथापि वह तेरह