पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३८३

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राबिन्सन क्रूसो।


लोग हमारी नाव पर चढ़ कर एक नाविक को ज्योंही पकड़ने गये त्योंही उसने हाथ की बन्दूक़ नीचे रख दी और भले आदमी की तरह अपने को पकड़ाने के लिए खड़ा हो गया। उसकी यह दशा देख मैं तलुवे से चोटी तक मारे क्रोध के जल उठा। किन्तु उस नाविक को मैंने जैसा मूर्ख समझ रक्खा था वास्तव में वह वैसा न था। चीनी ने हाथ बढ़ा कर ज्योंही उसे पकड़ना चाहा त्यों ही उसने चीनी का हाथ पकड़ कर ऐसा झटका दिया कि वह जहाज के भीतर धड़ाम से जा गिरा और उस चीनी के मस्तक को ऐसे जोर से ठोका कि उसीसे उसके प्राण निकल गये। दूसरे नाविक को पकड़ने गये तो उसने बन्दूक़ के कुन्दे से उनका अच्छा सत्कार किया। उससे पाँच आदमी जख्मी हुए। किन्तु इससे भी चीनी लोग शान्त न हुए। वे चालीस आदमी थे। हमारे नाविक गिनती में केवल पाँच थे और नाव पर बैठ कर जहाज़ की मरम्मत कर रहे थे। जहाज़ का छेद बन्द करने के लिए अलकतरा, मोम, चर्बी और तेल आदि मसाले गरम हो रहे थे। तेल खूब खौल रहा था। नाविको ने वही गरम तेल और अलकतरा उन चीनियों पर छिड़क दिया। खौलता हुआ तेल पड़ने से वे छटपटाते हुए पानी में जा गिरे। यह देख कर मिस्त्री ने चिल्ला कर कहा-"वाह, वाह! बड़ा अच्छा हुआ। सालों पर दो चार कलछी और डाल कर पूरे तौर से आतिथ्य कर दो। ये साले हमारे मेहमान हैं। इनकी खूब गरम गरम अभ्यर्थना करो।" यह कहते कहते वह खुद आगे बढ़ कर बड़ी फुरती से उन चीनियों पर गरम गरम तेल और अलकतरा छिड़कने लगा। चीनी लोग अजब तरह से चिल्लाते हुए वहाँ से भाग गये।