पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३९४

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क्रसे का स्थलमार्ग से खदेश को लौटना । ३६६ न के प्रभातकालिक सूर्य की प्रभा में वह स्वच्छ तुषार की भाँति झकाझक कर रहा था । उस मकान की सफेद दीवारों पर नीले रन की भाँति भाँति की तसवीरें आर्द्धित थीं । इससे - उसकी उम्र खच्छता कुछ कोमल हो गई थी । इस मकान की शोभा बड़ी विलक्षण थी । दल के मनुष्य रुके नहीं, नहीं तो मैं यहाँ कुछ दिन रह कर इस मकान को जी भर कर देख लेता । बाग के भीतर चीनी मिट्टी ही की मूर्तियाँ बनी थीं। तालाब का घाट चीनी मिट्टी का बँधा था। चीनी मिट्टी का सफ़ेद हौज़ बना था । उसमें लाल रक़ की मछलियाँ थीं ! सभी सुन्दर और सभी दर्शनीय थे। इस मनोरम दृश्य को देखते देखते मैं दल से पीछे रह गया । दो घंटे बाद काफ़िले में आ मिला । इस भूल के कारण मु' जुर्माना देना पड़ा और दलपति से क्षमा माँगनी पड़ी। यह भी आह्वीकार करना पड़ा कि अब ऐसी भूल न करंगा और सँभल कर रहूंगा। दो दिन के बाद हम लोग चीन की प्रसिद्ध दीवार के पार हुए । तातारदेशीय डाकुओं के आक्रमण से देश को बचाने के १. के लिए यह दी-दीवार बनाई गई थी । हमारे दल के लोग जितनी देर तक दीवार पार करते रहे उतनी देर तक मैं एक तरफ़ खड़ा होकर दीवार के चारों ओर जहाँ तक देख सका देखता रहा। दीवार पार होते ही बीच बीच में अश्वारोही तातार डाकुओं के साथ भेट होने लगी । वे लोग निरे डाकू थे। मुसाफ़िरों का माल लूटना ही उनका काम था। उन लोगों के

पास न कोई अच्छा अस्त्र-श था, न वे लोग आक्रमण करने

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