पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/५५

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राबिन्सन क्रूसो।

जब मैं पानी के नीचे दूर तक चला गया तब मेरे मन की जो अवस्था थी वह वाणी द्वारा नहीं समझाई जा सकती । यद्यपि मैं तैरना अच्छा जानता था तथापि तरंगों की भरमार से मुझे एक बार भी दम लेने की फुरसत न मिलती थी । आखिर समुद्र का हिलकोरा मुझे लिये दिये किनारे की जमीन पर पटक कर लैट चला । मेरी आँखें, नाक, कान, सब में पानी भर गया । पानी पीते पीते मैं बेदम हो गया था, पर तब भी मुझे इतना होश हवास और बल था कि मैं झट खड़ा हो गया और साहस करके स्थल-भाग की ओर इस भय से दौड़ चला, कि दूसरी बार का हिलकोरा फिर कहीं मुझे लौटा कर बीच समुद्र में न ले जाय । किन्तु मैंने देखा, उस तीव्रगामिनी तरंग से बचना कठिन है । समुद्र की लहर फ़िर पहाड़ के बराबर दीर्घ आकार धारण किये, क्रुद्ध शत्रु की भाँति गरजती हुई, मेरे पीछे दौड़ी चली आ रही है । उसके आक्रमण से बचने की कोई शक्ति या सामग्री मेरे पास न थी । मैं सोचने लगा--तरंग आने पर मैं अपने श्वास को रोक कर पानी पर उतराता हुआ स्थल की ओर चेष्टा करूँगा । बहुत दूर तक तो मुझे तरंग ही पहुँचा देगी । किन्तु समुद्र की ओर लौटती बार तरंग फिर कहीं मुझे समुद्र में न घसीट ले जाय, इसकी उस समय मेरे मन में बड़ी चिन्ता थी । समुद्र की लहर से बचने का एक भी उपाय न सूझता था ।

देखते ही देखते समुद्र की उत्ताल तरंग मेरे ऊपर आ पड़ी और मैं पन्द्रह बीस हाथ पानी के नीचे दब गया । मुझे कुछ कुछ मालूम हो रहा था कि मैं किसी बलिष्ठ शक्ति के द्वारा बड़े वेग से कछार के ऊपर हटाया जा रहा हूँ । मैं भी साँस रोक कर, यथाशक्ति पानी के भीतर ही भीतर तैरता