पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/५७

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राबिन्सन क्रूसो ।


ऊपर आ पड़ेगी । तब मैंने खूब ज़ोर से अँकवार भर कर पत्थर को पकड़ा और सास बन्द कर के लेट रहा । किनारे से वह जगह बहुत ऊँची थी, इसलिए तरंग हलकी सी होकर वहाँ आई । में तरंग के विरुद्ध पत्थर पकड़े पड़ा रहा । तरंग हटते ही फिर मैंने एक दौड़ लगाई । इस के बाद फिर एक तरंग यद्यपि मेरे ऊपर हो कर गई तथापि वह मुझे अपनी ओर खींच न सकी । उस तरंग के चले जाने पर मैं एक ही दौड़ में एक दम ऊपर चढ़ आया । इतनी देर में जाकर तरंग से मेरा पिण्ड छूटा । मैं किनारे के पास के पहाड़ से हट कर घास पर जा बैठा । तरंग की सीमा से बाहर रक्षित स्थान में पहुँचने पर मुझे अत्यन्त आराम मिला ।

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क्रसो और समुद्र-तट

मैं स्थल में आकर, विपत्ति से उद्धार पा, अपनी जीवन-रक्षा के लिए ऊपर की ओर देख कर परमेश्वर को धन्यवाद देने लगा । कुछ ही देर पहले जिस जीवन की कुछ भी आशा न थी उसे मृत्यु के मुख से सुरक्षित देख, मन में जो असीम आनन्द और उल्लास हुआ उसका वर्णन नहीं हो सकता । उस समय इतना अधिक आनन्द हुआ कि उस आवेग से ही मर जाने की आशंका हुई । कारण यह कि एकाएक अत्यन्त हर्ष होने से भी, अति विषाद की ही भाँति, चित्त अचेतन हो जाता है ।

मैं समुद्रतट पर, मारे खुशी के अकड़ता हुआ, हाथ उठाये अनेक प्रकार से अंग-भंगी करता हुआ घूमने लग । उस समय मेरे मन में सिर्फ यही चिन्ता थी कि मेरे सभी साथी डूब मरे; एक मैं ही "समुद्र से जीता-जागता बच निकला, ईश्वर ने मृत्यु के मुख से मुझे बचा लिया । मैंने अपने साथियों में