पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/८

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क्रूसो का गृहत्याग और तूफान।

इस जीवन-संग्राम में धनी और निर्धनों को सब प्रकार का दुःख सहना पड़ता है, किन्तु मध्यावित्त बालों को बैसा दुःख भोगने का अवसर नहीं आता । धनवान लोग अनाचार के असंयम और विलासपरायणता में पड़ कर और दरिद्र लोग कदन्न-भक्षण या निराहार के द्वारा स्वास्थ्य भंग करके जो अनेक कष्ट और अशान्ति भोगते हैं, उन यात- नाओं से मध्यवित्त के मनुष्य बिलकुल बचे रहते हैं।

इसलिए वत्स ! लड़कपन करके निश्चित सुख-शान्ति के लात मार कर, एकाएक विपत्ति के रुप में मत कूद पड़ो । मेरी बात पर ध्यान दो, नितान्त मूर्खों की भाँति काम करके बूढ़े माँ-बाप को कष्ट देना क्या ठीक है ? मैं बार बार तुम्हें सावधान करता हूँ-पिता के वचन की अवहेलना करने से भगवान् अप्रसन्न होंगे, उससे तुम्हारा अमंगल होगा।

यह कहते कहते उनका कण्ठ सँध गया, फिर वे कुछ बोल न सके। उनकी आंखों से झर झर कर आँसू गिरने लगे ।

यह देख कर मेरा जी व्याकुल हो उठा । मैंने निश्चय किया कि अब विदेश न जाऊँगा । पिता की इच्छा और आदेश के अनुसार देश में ही रह कर कोई रोज़गार करूंगा।

किन्तु हा खेद ! कुछ ही दिनों में मेरी यह प्रतिज्ञा छूमन्तर हो गई । मेरी बुद्रि फिर विदेशभ्रमण के लिए चंचल हो उठी। विदेश जाने के लिए फिर मेरी जीभ से लार टपकने लगी । पिता के अनुरोध से छुटकारा पाने के लिए मैंने कई सप्ताह के अनन्तर घर से भाग जाने ही का निश्चय किया।

किन्तु कल्पना के पहले उत्तेजना ने मुझे जितना पाबन्द कर रक्खा था, उतना शीघ्र में नहीं भागा। एक दिन मैंने