पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/९१

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राबिन्सन क्रूसो ।


होता था सही, पर मोमबत्ती की तरह स्थिर और साफ़ रोशनी न होती थी ।

जहाज़ पर से मैं बोरे भर अनाज ले आया था । एक दिन जाकर मैंने देखा कि समूचे बोरे का अन्न चूहों ने खा डाला, सिर्फ भूसी बच रही थी । तब मैंने बोरे का मुँह खोल कर भूसी को इधर उधर ज़मीन पर फेंक दिया ।

करीब एक महीने के बाद बरसात का पानी पाकर हरे हरे अंकुर मिट्टी के नीचे से निकल आये । यह देख कर मैं बड़े ही अचम्भे में आ गया । मैं सोचने लगा, पर निश्चय न कर सका कि ये किस पेड़-पौदे के अंकुर हैं । कुछ दिन बाद जब उन में दस बारह पत्ते निकल आये तब मैंने उन्हें सहज ही पहचान लिया । वे जौ के पौदे थे ।

यह देख कर मेरे मन में आश्चर्य का भाव उत्पन्न हुआ । और भाँति भाँति की चिन्तायें उदित हुई । उनका वर्णन करने में मैं सर्वथा अक्षम हूँ । अब तक मैं धर्म की सीमा से बाहर था । मैं नहीं मानता था कि धर्म भी कुछ है । मेरे भाग्यानुसार जब जो कुछ होजाता था उसे मैं एक घटना मात्र समझता था । ईश्वर के सम्बन्ध में भी मेरी बहुत हलकी सी कुछ कुछ धारणा थी; किन्तु इस समय इस जनशून्य टापू में, ऐसी विषम अवस्था में, मानो बिना ही बीज के अनाज के पौदे उत्पन्न होते देख मैंने परमेश्वर की दयालुता और संसार-भरण का पूरा परिचय पाया । मैंने समझा, ईश्वर ने मेरी ही रक्षा के लिए इस निर्जन टापू में अनाज उपजाया है । इस समय मेरे मन में दृढ़ विश्वास हुआ--

जाको राखे साँइयाँ मार सकै नहिं कोइ ।

बाल न बाँका करि सकै जो जग बैरी होई ॥