दो०-मातु मते महँ मानि मेहि, जो कछु करहिँ सो थोर ।
अघ अवगुन छमि आदरहिं, समुझि आपनी ओर ॥२३॥
माता के मत में मुझे मानैं तो जो कुछ करें वह थोड़ा ही है । मेरे पाप और अवगुणों को क्षमा कर यदि आदर करें तो अपनी ओर समझ कर करेंगे ॥२३॥
माता के कर्त्तव्य को सोच कर मन में भयभीत होना त्रास सञ्चारी भाव' है। दोषों को क्षमाकर यदि आदर करेंगे तो वह अपनी उदारता, सरलता से करेंगे 'वितर्क सञ्चारी भाव' है।'
चौ०-जौँ परिहरहि मलिन मन जानी। जौँ सन मोनहिँ सेवकमानी।
मोरे सरन सम की पनहीं । राम सुस्वामि दोष सब जनहीं ॥१॥
चाहै मलिन मन जान कर त्याग दें, चाहै सेवक मान कर सम्मान करें। मुझे रामच न्द्रजी की जूतियों का सहारा है, रामचन्द्रजी सुन्दर खामी हैं दोष सव दास का ( मेरा)ही हैं ॥१॥
जग जस-भाजन चातक मीना। नेम प्रेम निज निपुन नबीना ॥
अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेह सिथिल सब गाता ॥२॥
जगत में पपीहा और मछली यश के पात्र हैं जो अपने नेम तथा प्रेम में नित्य नये प्रवीण हैं । ऐसा मन में विचारते मार्ग में चले जाते हैं, सकुच और स्नेह से सब अंग ढीले पड़ गये हैं ॥२॥
चातक का नियम है कि स्वाति-बिन्दु के सिवा दूसरा जल नहीं पीता । मछली का प्रेम है कि जल का,वियोग होने पर प्राण तज देती है। इन उदाहरणों से अपने में होनता व्यक्ति करने का भाव है कि ये दोनों जड़ होकर भी नेम प्रेम में पके है । मैंने चेतन होकर न तो नेम ही निवाहा, क्योंकि जगह जगह बर माँगा । प्रेम भी नहीं निबाहा कि स्वामी का वियोग होने पर प्राण ही तज दिया हो, अतएव मैं इनसे भी गयाबीता हूँ।
फेरति मनहिँ मातु-कृत खोरी। चलत भगति-बल धीरज-धोरी॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥३॥
माता के किये हुए दोष मन को पीछे लौटाते हैं, पर भक्ति का बल उन्हें धीरज से इस वाम का उठाने वाला बना कर आगे चलाता है। जब रघुनाथजी के स्वभाव को समझते हैं (कि-कोटि चिम बध लागइ जाहू । पाये सरन तज नहिं ताडू) तब रास्ते में जल्दी जल्दी पाव पड़ने लगता है ॥३॥
भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जलप्रवाह जल-अलि गति जैसी ॥
देखि भरत कर सोच सनेहू । मा निषाद तेहि समय विदेहू ॥४॥
उस समय भरतजी की कैसी दशा है, जैसे जल की धारा में पानी के भंवर की चाल होती है। भरतजी का सोच और स्नेह देख कर निषाद उस समय विदेही हो गया अर्थात् शरीर की सुध वुध भुला गई ॥४॥