पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१८३

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J विनय-पत्रिका १८८ देखकर यह तुलसीदास बडा दुखी हो रहा है, (इसीसे वाध्य होकर) ऐसा कहना पडा ॥५॥ [११३] माधव ! अव न द्रवहु केहि लेखे। प्रनतपाल पन तोर, मोर पन जिअहुँ कमलपद देखें ॥१॥ जब लगि मैं न दीन, दयालु ते, मैं न दास, ते स्वामी। तव लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहि, जद्यपि अंतरजामी ॥२॥ ते उदार, मै कृपन, पतित मैं, तै पुनीत, श्रुति गावै। बहुत नात रघुनाथ ! तोहि मोहि, अब न तजे पनि आवै ॥३॥ जनक-जननि, गुरु-बंधु, सुहृद-पति, सव प्रकार हितकारी। द्वैतरूप तम-कूप परो नहिं, अस कछु जतन विचारी ॥४॥ सुनु अदभ्र करुना वारिजलोचन मोचन भय भारी। तुलसिदास प्रभु! तव प्रकास विनु, संसय टन टारी ॥५॥ भावार्थ-हे माधव ! अब तुम किस कारण कृपा नहीं करते ! तुम्हारा प्रण तो शरणागतका पालन करना है और मेरा प्रण तुम्हारे चरणारविन्दोंको देख-देखकर ही जीना है। भाव यह कि जब मै तुम्हारे चरण देखे बिना जीवन-धारण ही नहीं कर सकता, तब तुम प्रणतपाल होकर भी मुझपर कृपा क्यों नहीं करते ॥१॥ जबतक मैं दीन और तुम दयालु, मैं सेवक और तुम खामी नहीं बने थे, तबतक तो मैंने जो दुःख सहे सो मैंने तुमसे नहीं कहे, यद्यपि तुम अन्तर्यामीरूपसे सब जानते थे ॥ २॥ किन्तु अब तो मेरा-तुम्हारा सम्बन्ध हो गया है। तुम दानी हो और मैं कगाल हूँ, तुम पतितपावन हो और मैं पतित हूँ, वेद इस बातको गा रहे हैं।