पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१९

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विनय-पत्रिका नहीं, अब आधिभौतिक कष्टके रूपमें ये आपके किंकरगण मुझे सताने लगे हैं ॥३॥ इसलिये आप इन कठोर कर्म करनेवालोंको जल्द बुलाकर डाँट दीजिये, मैं आपकी बलैया लेता हूँ, क्योंकि ये दुष्ट तुलसीदासरूपी तुलसीके पेडको कुचल कर उसकी जगह शाखोटी (सहोर ) के पेड़ लगाना चाहते हैं ॥४॥ [९] सिव ! सिव होइ प्रसन्न करु दाया। करुनामय उदार कारति, बलि जाउँ हरहु निज माया ॥ १।। जलज-नयन, गुन-अयन, मयन-रिपु,महिमा जान न कोई। विनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनेहुँ भगति न होई ॥ २॥ रिपय, सिद्ध,मुनिःमनुज दनुज,सुर,अपरजीवजग माहीं। तव पद विमुख नपार पाव कोउ, कलर कोटि चलिज हीं॥३॥ अहिभूषन, दूषन-रिपु-सेवक, देव-देव, त्रिपुरारी। मोह-निहार-दिवाकर संकर, सरन सोक-भयहारी ॥ ४ ॥ गिरिजा-मन-मानस-मराल, कासीस, मसान-निवासी। तुलसिदास हरि-चरन-कमल-धर, देहु भगति अविनासी ॥ ५ ॥ भावार्थ-हे कल्याणरूप शिवजी ! प्रसन्न होकर दया कीजिये। आप करुणामय हैं, आपकी कीर्ति सब ओर फैली हुई है, मैं बलिहारी जाता है, कृपापूर्वक अपनीमायाहर लीजिये॥१॥ आपके नेत्र कमल- के समान हैं, आप सर्वगुणसम्पन्न हैं, कामदेवके शत्रु हैं । आपकी कृपा बिना न तो कोई आपकी महिमा जान सकता है और न श्रीरामके चरणकमलों में, स्वप्नमें भी उसकी भक्ति होती है ॥ २॥ ऋषि, सिद्ध, मुनि, मनुष्य, दैत्य, देवता और जगत्में जितने जीव हैं,