पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२०२

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२०७ विनय-पत्रिका ठिकाने न होनेसे ) पापोका नाश नहीं होता । रक्तबीज राक्षसकी भाँति ये पाप तो वढते ही जा रहे है। भाव यह है कि बुद्धिकी विकलतासे पापमे पुण्य-बुद्धि और पुण्यमें पाप-बुद्धि हो रही है, इससे पुण्य करते भी पाप ही बढ़ रहे हैं ॥३॥ हे तुलसीदास ! इस पापरूपी राक्षसोंके समूहका नाश तो केवल प्रभुकी कृपारूपी कालिकाजी ही करेंगी । ( भगवत्कृपाकी शरण लेनेके सिवा अब अन्य किसी साधनसे काम नहीं निकलेगा) ॥४॥ [१२९] रुचिर रसना तू राम राम राम क्यों न रटत । सुमिरत सुख सुकृत बढ़त, अघ-अमंगल घटत ॥१॥ विनु श्रम कलि कलुषजाल कट कराल कटत। दिनकरके उदय जैसे तिमिर-तोम फटत ॥२॥ जोग, जाग, जप, बिराग, तप, सुतीरथ-अटत । वाधिवेको भव-गयंद रेनुकी रजु बटत ॥ ३॥ परिहरि सुरस्मनि सुनाम, गुंजा लखि लटत। लालच लघु तेरो लखि तुलसि तोहि हटत ॥४॥ भावार्थ-हे सुन्दर जीभ ! तू राम-राम क्यों नहीं रटती! जिस रामनामके स्मरणसे सुख और पुण्य बढ़ते हैं तथा पाप और अशुभ घटते हैं।॥१॥रामनाम-स्मरणसे बिनाही परिश्रमके, कलियुगके कटु और भयानक पापोंका जाल वैसे ही कट जाता है, जैसे सूर्यके उदय होनेसे अन्धकारका समूह फट जाता है ॥ २ ॥ रामनामको छोड़कर योग, यज्ञ, जप, तप, वैराग्य और तीर्थाठन करना वैसा ही है, जैसे संसाररूपी गजराजके बाँधनेके लिये धूलके कणोंकी रस्सी