पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२१२

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२१७ विनय-पत्रिका प्रभु रामचन्द्रजी भी मनमें प्रसन्न होंगे। अरे ! श्रीरघुनाथजी तो तभी प्रसन्न हो जायँगे, जब तूहाथ जोड़कर मस्तक नवा देगा। तुलसीदास! तू उसी क्षण जन्म और जीवनका फल पा जायगा, अर्थात् तुझे श्रीरामजी दर्शन देंगे। तू राम-नामका जप कर, रामको प्रणाम कर, उनके गुण-समूहोंका कीर्तन कर और हृदयमें श्रीरामजीको विराजित कर तथा अपने मनको जगदीश श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें नित्य निवास करनेवाला भ्रमर बनाकर पृथ्वीपर निर्भय विचरण कर ॥५॥ [१३६] [१] जिव जवतें हरित विलगान्यो। तबते देह गेह निज जान्यो । मायावस स्वरूप विसरायो । तेहि भ्रमते दारुन दुख पायो । पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो। भव-सुल,सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तूहठि हठि चल्यो । वहुजोनिजनम, जरा, विपति, मतिमंद ! हरि जान्योनहीं। श्रीराम विनु विश्राम मूढ ! विचारु लखि पायो कहीं। [२] आनँद- सिंधु-मध्य तव वासा। विनु जाने कस मरसि पियाला ॥ मृग-भ्रम वारि सत्य जिय जानी। तह तू मगन भयो सुख मानी ॥ तहँ मगन मज्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाहीं जहाँ। निज सहज अनुभवरूप तव खल! भूलि अब आयोतहाँ॥ निरमल, निरंजन, निरविकार, उदार सुख ते परिहरन्यो। नि:काज राज विहाय नृप इव सपन कारागृह परयो ।