पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२१४

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२१९ विनय-पत्रिका जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करें। सोइ करे विविध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥ कौमार, सैसव अरु किसोर अपार अघ को कहि सके। - व्यतिरेक तोहि निरदय महाखलआन कहु कोसहि सके। जोवन जुक्ती सँग रँग रात्यो । तव तू महा मोह-मद मात्यो । ताते तजी घरम-मरजादा । बिसरे तव सब प्रथम विषादा ॥ विसरे विषाद, निकाय-संकट समुझिनहिं फाटत हियो। फिरि गर्भगत-आवर्त संसृतिचक्र जेहि होइ सोइ कियो । कृमि-भस-विट-परिनामतनु, तेहि लागि जग बेरीभयो। परदार, परधन, द्रोहपर, संसार वाढ़े नित नयो॥ [८] देखत 'ही आई विरुधाई । जो ते सपनेहु नाहिं बुलाई ॥ ताके गुन कछु कहे न जाही। सो अव प्रगट देखु तनु माहीं॥ सो प्रगट तनु जरजर जरावस, व्याधि सूल सतावई। सिर-कंप, इन्द्रिय-सक्ति प्रतिहत, वचन काहुन भावई ॥ गृहपालइते अति निरादर, खान-पान न पावई। " ऐसिड दसा न विराग तह, तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥ कहि को सकै महाभव तेरे । जनम एकके कछुक गरे। 'चारि खानि संतत अवगाहीं। अजहु न कर विचार मनमाहीं॥ अजहूँ विचारु, विकार तजि, भजुराम जन-सुखदायकं । भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुरनायकं ॥ विनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं । ' कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ।