पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२१७

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विनय-पत्रिका २२२ इसी प्रकार जीव भी सच्चिदानन्दस्वरूपको भ्रमवश मूलकर जगत्में अपनेको मायासे बँधा मान लेता है और दुखी होता है। तूने स्वयं ही ( अज्ञानसे ) अपनी कर्मरूपी रस्सी मजबूत कर ली, और अपने ही हाथोंसे उसमें ( अविद्याकी ) पक्की गाँठ भी लगा दी। इसीसे हे अभागे । तू परतन्त्र पड़ा हुआ है। और इसीका फल आगे गर्भमे रहनेका दुःख होगा । संसारमे जो अनेक क्लेशोंके समूह हैं उन्हे वही जानता है जो माताके पेटमें पड़ा है। गर्भमें सिर तो नीचे और पैर ऊपर रहते हैं । इस भयानक संकटके समय कोई वात भी नहीं पूछता । रक्त, मल, मूत्र, विष्ठा, कीड़े और कीचसे घिरा हुआ (गर्भमें ) सोता है । कोमल शरीरमें जब बड़ी भारी वेदना होती है, तब सिर धुन-धुनकर रोता है। [४] इस प्रकार जहाँ तुझे तेरे कर्मजालने घेर लिया था ( और उसके कारण तू दु.ख पाता था) श्रीहरिने वहाँ भी तेरा साथ नहीं छोडा । (गर्भमे ) प्रभुने नाना प्रकारसे तेरा पालन-पोषण किया, और फिर परम कृपालु स्वामीने तुझे वहीं ज्ञान भी दिया । जब तुझे हरिने ज्ञान-विवेक दिया तब तुझे अपने अनेक जन्मोंकी बातें याद आयीं और तू कहने लगा--'जिसकी यह त्रिगुणमयी माया अति दुस्तर है, मैं उसी परमेश्वरकी शरण हूँ। जिस मायाने जीव-समूहको अपने वशमे करके उनके जीवनको नीरस अर्थात् आनन्दरहित कर दिया है और जो प्रतिदिन अत्यन्त नयी बनी रहती है, (ऐसी