पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२२८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२३३ विनय-पत्रिका मेरी यह विनती सुनकर श्रीरामजीने आनन्दसे मेरी ओर देखा और मुसकराकर करुणाकी ऐसी वृष्टि की जिससे सारी भूमि तर हो गयी। ( हृदयका सारा स्थान शान्तिसे पूर्ण हो गया ) रामराज्य होनेसे सब काम सफल हो गये। शुभ शकुन होने लगे, क्योंकि महाराज रामचन्द्रजी जगद्विजयी हैं ( हृदयमे उनके विराजित होते ही कलियुगकी सारी सेना भाग गयी)॥१०॥ सर्वसमर्थ ज्ञानवरूप दयालु स्वामीने पुण्यरूपी सेनाको हारनेसे जिता लिया, सद्भक खभावसे ही आदरपूर्वक उनकी सराहना करते हैं, कि नाथने सहज ही सारी यातनाएँ दूर कर दी ॥ ११॥ (परन्तु ) आप ऐसा क्यों न करते ? आपका तो सदासे यह बाना चला आता है कि उजडे हुएको बसाना और गयी हुई वस्तुको फिरसे दिला देना ( जैसे विभीषण और सुग्रीवको राज्यपर बिठा देना, जैसे रावणके भयसे डरे हुए देवताओंको फिरसे स्वर्गमें बसा देना)। हे तुलसी | दुखियोंके दुःख दूर कर भगवान्ने किस-किसको अभय बॉह नहीं दी ॥१२॥ [१४०] ते नर नरकरूप जीवत जग भव-भंजन-पद-बिमुख अभागी। निसिवासररुचि पापअसुचिमन,खलमति-मलिन, निगमपथ-त्यागी नहिं सतसंग भजन नहिं हरिको, स्त्रवन न रामकथा-अनुरागी। सुत-वित-दार-भवन-ममता-निसिसोवत अति नकबहुँमतिजागीर तुलसिदास हरिनाम-सुधातजि,सठ हठि पियत बिषय-विषमाँगी। सूकर-खान-सृगाल-सरिस जन,जनमत जगतजननि-दुख लागी।। भावार्थ-वे अभागे मनुष्य संसारमें नरकरूप होकर जी रहे हैं, जो जन्म-मरणरूप भवका भजन करनेवाले श्रीभगवान्के चरणोंसे