पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२२९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका २३४ विमुख हैं । उनकी रुचि रात-दिन पापोंमें ही लगी रहती है । उनका मन अशुद्ध रहता है। उन दुष्टोंकी बुद्धि मलिन रहती है, और वे वेदोक्त मार्गको छोड़े हुए हैं॥१॥ न तो वे संतोंका संग ही करते हैं, ___न भगवद्भजन करते हैं और न उनके कानोंको श्रीरामकी कथा प्यारी लगती है । वे तो बस, सदा-सर्वदा स्त्री-पुत्र, धन और मकान आदिकी ममतारूपी रात्रिमें ही अचेत सोते रहते हैं। उनकी बुद्धि (इस 'मेरे-मेरे'की निद्रासे)कभी जागती ही नहीं ॥२॥ हे तुलसीदास ! जो दुष्ट श्रीहरि-नामरूपी अमृतको छोड़कर हठपूर्वक विषयरूपी जहर माँग-मॉगकर (धन-पुत्र आदिकी कामना करके) पीते हैं वे मनुष्य सूअर, कुत्ते और गीदड़के समान जगत्में केवल अपनी माँको दुःख देनेके लिये ही जन्म लेते हैं ॥ ३ ॥ [१४१] रामचंद्र ! रघुनायक तुमसो ही विनती केहि भाँति करौं। अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौं ॥१॥ पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिं हृदय धरौं। देखि आनकी विपतिपरमसुख,सुनिसंपति विनु आगि जरौ ॥२॥ भगति-विरागग्यानसाधन कहि वहु विधिडहकत लोगफिरौं । सिव-सरवस सुखधाम नाम तव, बंचि नरकप्रद उदर भरौं ॥३॥ जानत हाँनिजपापजलधि जिय,जल-सीकर समसुनत लगे। रज-समपर-अवगुन सुमेरु करि,गुन गिरि-सम रजते निदरौं ॥४॥ नानावेष बनाय दिवस-निसि, पर-वित जेहि तेहि जुगुतिहरौं । एको पल न कबहुँ अलोल चित हित दै पद-सरोल सुमिरौं ॥५॥ जो आचरन विचारहु मेरो, कलप कोटि लगि औटि मरौं। तुललिदास प्रभु कृपा-विलोकनि, गोपद-ज्यों भवसिंधु तरौं ॥६॥