पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२६८

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२७३ विनय पत्रिका उद्धार कर दिया ॥ ६॥ सुग्रीव 'बंदर अपने भाई (बालि ) के भयसे व्याकुल होकर जब पुकारता हुआ आपकी शरणमें आया, तब आप अपने उस दासका दारुण दुःख नहीं सह सके और गालियाँ सहकर भी बालिका वध कर डाला ॥ ७॥ विभीषण शत्रु (रावण) का भाई था और जातिका राक्षस था ! वह किस भजनका अधिकारी था किन्तु जब वह आपकी शरणमें आया तब आपने उसे आगे बढ़कर लिया और भुजा पसारकर हृदयसे लगाया ॥ ८॥ बंदर और रीछ ऐसे अधर्मी हैं कि उनका नामतक लेनेसे अमङ्गल होता है, किन्तु हे नाथ ! उनको भी आपने पवित्र बना लिया। वेद इस बातके साक्षी हैं, यह सब आपकी महिमा है॥ ९॥ मैं कहाँतक कहूँ? ऐसे असंख्य दीन हैं, जिनकी विपत्तियों आपने दूर कर दी हैं, किन्तु न जाने इस तुलसीदासपर, जो कलियुगके पापोंसे जकड़ा हुआ है, आप कृपा करना क्यों भूल गये ॥ १०॥ [१६७] रघुपति-भगति करत कठिनाई। कहत सुगम करनी अपार जानै सोइ जेहि बनि आई ॥१॥ जो जेहि कला कुसल ताकह सोइ सुलभ सदासुखकारी। सफरी सनमुख जल-प्रवाह सुरसरी बहै गज भारी ॥२॥ ज्यों सर्करा मिलै सिकता मह, बलतेन कोउ विलगावै। अति रसग्य सूच्छम पिपीलिका विनु प्रयास ही पावै ॥३॥ सकल दृश्य निज उदर मेलि, सोवे निद्रा तजि जोगी। सोइ हरिपद अनुभवै परम सुख, अतिसय द्वैत-वियोगी ॥ ४॥ सोक मोह भय हरष दिवस-निसि, देस-काल तहँ नाही। तुलसिदास यहि दसाहीन संसयं निरमूल न जाहीं ॥५॥ वि० ५० १८-