पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२८९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


प्रितय-पत्रिका २९५ नहीं है, सब प्रकारसे निराधार हूँ॥२॥ जिसमे में (प्यासके मारे) पानी मॉगता है, वह उलटा मुझसे ही अमृत पिलाने के लिये कहता है । मैं अपनी बात किससे कहूँ ! किसीसे भी कहनेकी हिम्मत-सी नहीं पडती ॥ ३ ॥ हे वापजी : बलिहारी। आप ही मेरे लिये वैसा कोई अच्छा उपाय कर दीजिये। क्योंकि आपके ( कृपादृष्टिसे ) देखते ही हारनेपर भी अच्छा दाँव-सा हाय लग जाता है। भाव, बडे-बडे पापी भी आपकी कृपासे वैकुण्ठके अधिकारी हो जाते हैं | ४ || आप यदि सुझा दें तो अदृश्य वस्तु भी दीखने लगती है और आपके समझा देनेपर नहीं समझमे आने- वाला ( आपका खरूप ) पदार्थ भी समझमें आ जाता है। अब आप उसे ही सुझा और समझा दीजिये ॥ ५॥ देखिये, आपके नामका जो अवलम्बन है, वही तो पानी है और उसमें रहनेवाला में दीन मीनोंका राजा-सा हूँ, बडे भारी मत्स्यके समान हूँ। मैं जो प्रभुके सामने इसमें कुछ भी बनावटी बात कहता होऊँ तो मेरी यह जीभ जल जाय ॥ ६॥ मेरी बात सभी तरहसे बिगड चुकी है, केवल एक ही अच्छा बानक-सा बना हुआ है, और वह यह कि तुलसीदासने यह बात अपने दयालु खामीको जना दी है । ( अब खामी आप ही बिगड़ी बनावेंगे)॥ ७॥ राग आसावरी [१८३] राम! प्रीतिकी रीति आप नीके जनियत है। बडेकी बड़ाई छोटेकी छोटाई दूरि कर, ऐसी विरुदावली, बलि, बेद मनियत है ॥१॥