पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३००

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२०५ विनय-पत्रिका पॉच होनेसे जोड़ी नही है इसीलिये विषम हैं, एक-से नहीं हैं और पाँचों ही इन्द्रियाँ विषय-भोगोंके पीछे मतवाली हो रही हैं । कुकर्मों- के कारण जब शरीर और मन ही तामस विषयाकार हैं तब इन्द्रियाँ विषयोंसे हटी हुई कैसे हों ? ) और वे पाँव बटोरकर-समान पैर रखकर नहीं चलते । ( इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंकी ओर दौड़ती हैं ) इससे कभी ऊँचे, कभी नीचे चलनेसे धक्के और झटके लग रहे हैं, इस खींचतानमें वडा ही दु ख हो रहा है । (कभी स्वर्ग या कीर्ति आदिकी इच्छासे धर्मकार्यमे, कभी भोगोंकी प्राप्तिके लिये संसारके विविध व्यवसायोंमें, कभी कामवश होकर स्त्रियोंके पीछे। सो भीसमान- भावसे नहीं-शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध--इन अपने-अपने विषयों- द्वारा कभी ऊँचे और कभी नीचे जाती हैं, फलखरूप जीव महान् क्लेश पाता है)॥ ३ ॥ रास्तेमें कॉटे बिछे हैं, कंकड पड़े हैं (विषैली वेलें लपेटती हैं और झाडियों उलझा लेनी है, इस प्रकार जगह-जगह रुकना पड़ता है। परमात्माको भुलाकर सासारिक विषयोंके घने जंगलमें दौड़नेवाली इन्द्रियोंको विपय-नाशरूपी काँटे प्रतिकूल विषयरूपीकंकड़, घर-परिवारकी ममतारूपी लपेटनेवाली वेलें और कामनारूपी उलझन है, जिनसे पद-पदपर रुककर दुःख भोगते हुए चलना पडता है। ) फिर ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं त्यों ही-त्यों अपना घर दूर होता चला जा रहा है। (संसारके भोगोंमें ज्यों-ज्यों मन फंसता है त्यों-ही-त्यों भगवत्- प्राप्तिरूपी निज-निकेतन दूर होता जाता है) और कोई राह बतानेवाला भी नहीं है। (विषयी पुरुष संतोंका सग ही नहीं करते, फिर उन्हें सीधा परमार्थका रास्ता कौन बतावे ? संगवाले तो उलटा ही मार्ग बतलाते हैं।)॥ ४॥ मार्ग बड़ा कठिन है, (विषयोंके झाड़-झंखाड़ों और वि०प० २०-