पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३०१

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विनय-पत्रिका ३०६ पहाड़-जगलोंसे परिपूर्ण है ) साथमें (भजनरूपी)राह-खर्च नहीं हैं, यहाँ- तक कि अपने गाँवका नामतक भूल गये हैं ( भूलकर भी परमात्माका नाम नहीं लेते और परमात्मखरूपपर विचार नहीं करते, अतएव भगवान्की कृपा बिना इस शरीरके द्वारा तो परमपदरूपी घर पहुँचना असम्भव ही है); इसलिये हे श्रीरामजी! अब आप ही कृपा करके इस तुलसीदासके (जन्म-मरणरूपी) ससार-भयको दूर कीजिये ॥५॥ [१९०] सहज सनेही रामसो ते कियो न सहज सनेह । तातें भव-भाजन भयो, सुनु अजहुँ सिखावन एह ॥ १॥ ज्यों मुस्न मुकुर विलोकिये अरु चित न रहै अनुहारि। त्यों सेवतहुँ न आपने ये मातु-पिता, सुत-नारि ॥२॥ दै दै सुमन तिल वासिक, अरु खरि परिहरि रस लेत । स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक तन सेत ॥३॥ करि वीत्यो, अव करतु है करिवे हित मीत अपार । फयहुँ न कोउ रघुवीर सो नेह निवाहनिहार ॥ ४॥ जासों सव नातो फुरै, तासो न करी पहिचानि । ताते क्लू समुझ्यो नहीं, कहा लाभ कह हानि ॥ ५॥ साँचो जान्यो झूटको, झुठे कह सॉत्रो जानि । को न गयो, को जान है, को न जैद करि हितहानि ॥६॥ वेद कहो, बुध कहत है, अरु होहुँ कहत ही टेरि। तुलसी प्रभु साँचो हितू तू हियकी ऑपिन होरा -तने खभावमेहीस्नेह करनेवाले श्रीगमचन्द्रजीसेवाभा- विकलेह नहीं किया। इसीसे वू संसारी हो गया है (जन्म-मरणके चक्रमें