पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३१२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३१७ विनय-पत्रिका करोड़ों उपाय क्यो न करे, पर उसके दैहिक, दैविक, भौतिक तीनों ताप नष्ट नहीं हो सकते, यह बात मुनिश्रेष्ठ शुकदेवजीने भुजा उठाकर कही है ॥ १॥ अपने खभावकी टेवको छोड़कर-श्रीरामविमुखताकी आदत छोड़कर एकाग्र चित्तसे तू ही विचारकर देख कि कहीं पानीके मथनेसे, बिना दूधके घी मिल सकता है ? ( इसी प्रकार विषयोंमे रत रहनेसे कभी सुख नहीं मिल सकता ।) इस बातको समझकर भ्रमको छोड़ दे और श्रीरामचन्द्रजीके उन युगल चरणोंका भजन कर, जो सेवासे सुलभ हैं और सद्गुणोंके गम्भीर वन हैं अर्थात् जिन चरणोंकी सेवा करनेसे विवेक, वैराग्य, शान्ति, सुख आदि अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं ॥ २ ॥ बुद्धि स्थिर करके शास्त्रों, वेदों, अन्य ग्रन्थों, ऋषियों, मुनियों, देवताओं और संतोंका जो एक "निश्चित सिद्धान्त है, उसे सुन ( वह सिद्धान्त यही है कि सब आशाओंको छोडकर श्रीभगवान्के शरण होना चाहिये) । हे तुलसीदास ! यद्यपि गङ्गाका तट निकट है, तो भी बिना खामीके पशु प्यासा ही मरा जाता है (इसी प्रकार यद्यपि भगवत्-प्राप्तिरूप परम सुख सहज ही मिल सकता है पर भगवान्की शरण हुए बिना वह दुर्लभ हो रहा है ) ॥ ३ ॥ [१९७] नाहिंन चरन-रति ताहि ते सही विपति, कहत श्रुति सकल मुनि मतिधीर। वसै जो ससि-उछंग सुधा-खादित कुरंग, ताहि क्यों भ्रम निरखि रबिकर-नीर ॥१॥ सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अग्यान, पढ़िय न समुझिय जिमि खग कीर