पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३१५

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विनय-पत्रिका ३२० न कर । अरे अधम ! जब ये सब तुझे अन्त समयमे छोड ही देंगे, तो तू इन्हें अभीसे क्यों नहीं छोड देता ? ( इनका मोह छोडकर अभीसे भगवान्में प्रेम क्यों नहीं करता?)॥३॥ अरे मूर्ख! ( अज्ञान- निद्रासे) जाग, अपने खामी ( श्रीरघुनाथजी) से प्रेम कर और हृदयसे ( सासारिक विषयोंसे सुखकी ) दुराशाको त्याग दे; (वियोम सुख है ही नहीं, तब मिलेगा कहाँसे 2 ) हे तुलसीदास ! जैसे अग्नि बहुत-सा घी डालनेसे नहीं बुझती ( अधिक प्रचलित होती है), वैसे ही यह कामना भी ज्यों-ज्यों विषय मिलते हैं त्यों-ही-त्यों बढ़ती जाती है। (यह तो संतोषरूपीजलसे ही वुझसकती है)॥४॥ [१९९] काहेको फिरत मूढ़ मन धायो । तजि हरि-चरन सरोज सुधारस, रविकर जल लय लायो ॥१॥ त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो। गृह, वनिता, सुत, बंधुभये बहु,मातु-पिता जिन्ह जायो॥२॥ जाते निरय-निकाय निरंतर सोइ इन्ह तोहि सिखायो। तुव हित होइ कटै भव-वन्धन, सो मगु तोहि न बतायो ॥३॥ अजहुँ विषय कह जतन करत, जद्यपि बहुविधि डहँकायो। पावक काम भोग-घृत ते सठ कैसे परत वुझायो ॥४॥ विषयहीन दुग्व, मिले विपति अति सुख सपनेहुँ नहिं पायो। उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यो धन दुखप्रद श्रुति गायो॥ ५॥ छिन-छिन छीन होत जीवन, दुरलभ तनु वृथा गॅवायो। तुलसिदास हरिभजहि आस तजि काल-उरग जग खायो ॥६॥ भावार्थ-'अरे मूर्ख मन ! किसलिये दौड़ा-दौड़ा फिरता है? श्रीहरिके चरणकमलोंके अमृत-रसको छोडकर ( विषयरूपी ) मृग-