पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३१४

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विनय-पत्रिका मुझे जप-तप करना आता है और न प्राणायामसे ही मैंने मन वशमें किया है। इस तुलसीदासको तो करुणाके भण्डार भगवान् रामचन्द्र- जीका ही एकमात्र भरोसा है । वही इसकी भयानक सासारिक विपत्तिको दूर करेंगे, जन्म-मरणसे मुक्त करेंगे ॥ ३ ॥ राग-भैरवी [१९८] मन पछितैहै अवसर बीते । दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम बचन अरु ही ते ॥१॥ सहसवाहु, दसवदन आदि नृप बचे न काल वली ते। हम-हम करि धन धाम सवारे, अंत चले उठि रीते ॥२॥ सुन-वनितादि जानि खारथरत, न करु नेह सवही ते । अंतहु तोहिं तजेंगे पामर ! तू न तजै अव ही ते ॥३॥ अव नाहिं अनुराग, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते । बुझै काम अगिनी तुलसी कहुँ, विषय भोग बहु धी ते ॥४॥ भावार्थ-अरे मन ! ( मनुष्य-जन्मकी आयुका यह ) सुअवसर बीत जानेपर तुझे पछताना पड़ेगा। इसलिये इस दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर कर्म, वचन और हृदयसे भगवान्के चरण-कमलोंका भजन कर ॥१॥ सहस्रबाहु और रावण आदि ( महाप्रतापी ) राजा भी बलवान् कालसे नहीं बच सके, उन्हें भी मरना पड़ा। जिन्होंने 'हम हम' करते हुए धन और धाम सँभाल-सँभालकर रक्खे थे, वे भी अन्त समय यहाँसे खाली हाथ ही चले गये ( एक कौडी भी साथ न गयी)॥२॥ पुत्र, स्त्री आदिको खार्थी समझ इन सबसे प्रेम