पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३१८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३२३ विनय-पत्रिका [२०१] लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहुँ कबहुँक घटत न काज पराये ॥१॥ जो सुख सुरपुर-नरक, गेह-चन आवत विनहिं बुलाये । तेहि सुख कहँ बहुजतन करतमन, समुझत नहिं समुझाये ॥२॥ पर-दारा, पर द्रोह, मोहवस किये मूढ़ मन भाये। गरभवास दुखरासि जातना तीव्र विपति विसराये ॥ ॥३॥ भय-निद्रा, मैथुन-अहार, सबके समान जग जाये। सुर-दुरलभ तनु धरिन भजे हरि मद अभिमान गवाये ॥४॥ गई न निज-पर-वुद्धि, शुद्ध है रहे न राम-लय लाये। तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनि के पछिताये ॥५॥ भावार्थ-मनुष्य-शरीर पानेसे क्या लाभ हुआ जब कि वह कभी स्वप्नमें भी मन, वाणी और शरीरसे दूसरेके काम नहीं आया ॥ १॥ विषयसम्बन्धी जो सुख खर्ग, नरक, घर और वनमें बिना ही बुलाये, आप-से-आप आ जाता है, उस सुखके लिये, अरे मन ! तू अनेक प्रकारके उपाय कर रहा है। समझानेपर भी नहीं समझता ॥२॥ हे मूढ ! तूने अज्ञानके वश होकर परायी स्त्रीके लिये और दूसरोंसे वैर करनेके लिये मनमाने आचरण किये । गर्भमें महान् दुःख, दारुण कष्ट और विपत्ति भोगी थी, उसे भूल गया ( यह नहीं सोचा कि इन मनमाने कुकर्मोंसे फिर वही गर्भवासके दुःख भोगने पड़ेंगे)॥ ३ ॥डर, नींद, मैथुन और भोजन आदि तो संसारमें जन्म लेनेवाले सभी जीवोंमे एक-से हैं ! परन्तु तूने तो देवताओंको भी दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर उससे भी भगवान्का भजन नहीं किया