पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३२

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विनय-पत्रिका चर्म, चर्म कर कृपाण, शूल-शेल-धनुषवाण, धरणि, दलनि दानव-दल, रण-करालिका । पूतना-पिशाच-प्रेत-डाकिनि-शाकिनि-समेत भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥२॥ जय महेश-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी, समस्त-लोक-स्वामिनी हिमशैल-चालिका। रघुपति-पद् परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम, देहु द्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ॥ ३ ॥ भावार्थ-हे जगत्की माता! हे देवि !! तुम्हारी जय हो, जय हो । देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते है। तुम भोग और मोक्ष दोनोंकी ही देनेवाली हो । भक्तोंका भय दूर करनेके लिये तुम कालिका हो। कल्याण, सुख और सिद्धियोंकी स्थान हो । 'तुम्हारा सुन्दर मुख पूर्णिमाके चन्द्रके सदृश है। तुम आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापरूपी अन्धकारका नाश करनेके लिये मध्याह्नके तरुण सूर्यकी किरण-माला हो ॥१॥ तुम्हारे शरीरपर कवच है । तुम हाथोंमें टाल-तलवार, त्रिशूल, सांगी और धनुष-बाण लिये हुए हो । दानवोंके दलका संहार करनेवाली हो, रणमें विकराल रूप धारण कर लेती हो। तुम पूतना, पिशाच, प्रेत और डाकिनी-शाकिनियोंके सहित भूत, ग्रह और वेतालरूपी पक्षी और मृगोंके समूहको पकडने- के लिये जालरूप हो ॥२॥ हे शिवे ! तुम्हारी जय हो । तुम्हारे अनेक रूप और नाम हैं। तुम समस्त संसारकी खामिनी और हिमाचलकी कन्या हो । हे शरणागतकी रक्षा करनेवाली ! मैं वि०प०३-