पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३३४

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२३९ विनय-पत्रिका उस (जन्म-मरण) भयको कुछ भी नहीं समझता (अन्त्यज, पशु और पक्षियोंतकका उद्धार हो गया है तब मेरा क्यों न होगा ! अर्थात् अवश्य होगा) ॥ ५॥ [२१० और कहँ ठौर रघुवंस भनि ! मेरे। पतित-पावन प्रनत-पाल असरन-सरन, ___ बाँकुरे विरुद विरुदैत केहि केरे ॥१॥ समुझि जिय दोस अति रोस करि राम जो, करत नहिं कान बिनती बदन फेरे। तदपि है निडर हाँ कहाँ करुना-सिंधु, क्योऽव रहि जात सुनि बात बिनु हेरे ॥२॥ मुख्य रुचि होत वसिवेकी पुर रावरे, राम ! तेहि रुचिहि कामादि गन धेरे । अगम अपवरग, अरु सरग सुकृतैकफल, नाम-बल क्यों बसों जम-नगर नेरे ॥३॥ कतहुँ नहिं ठाउँ, कहँ जाउँ कोसलनाथ ! दीन वितहीन हौं, विकल बिनु डेरे। दास तुलसिहि बास देहु अव करि कृपा, बसत गज गीध ब्याधादि हि खेरे ॥४॥ भावार्थ-हे रघुवंशमणि ! मेरे लिये (आपके चरणोंको छोड़कर) और कहाँ ठौर है ? पापियोंको पवित्र करनेवाले, शरणागतोंका पालन करनेवाले एवं अनायोंको आश्रय देनेवाले एक आप ही हैं। 'आपका-सा बाँका बाना किस बानेवालेका है ? (किसीका मी नहीं)॥१॥हे रघुनाथजी ! मेरे अपराधोंको मनमें समझकर, अत्यन्त