पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३३६

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विनय-पत्रिका जोनि बहु जनमि किये करम खल विविध विधि, अघम आचरन कछु हृदय नहि घरहुगे। दीनहित ! अजित सरवग्य समरथ प्रनतपाल चित मृदुल निज गुननि अनुसरहुगे ॥२॥ मोह-मद-मान कामादि खलमंडली सकुल निरमूल करि दुसह दुख हरहुगे। जोग-जप-जग्य-बिग्यान ते अधिक अनि अमल दृढ़ भगति दै परम सुख भरहुगे ॥ ३ ॥ मंदजन-मौलिमनि सकल साधन-हीन, कुटिल मन, मलिन जिय जानि जो डरहुगे। दासतुलसी वेद-विदित विरुदावली विमल जस नाथ ! केहि भाँति बिस्तरहुगे ॥ ४॥ भावार्थ-हे रघुवंशमणि ! कभी आप मुझपर भी वही कृपा करेंगे जिसके प्रतापसे व्याध ( वाल्मीकि ), गजेन्द्र, ब्राह्मण अजामिल और अनेक दुष्ट संसारसागरसे तर गये १ हे नाथ ! क्या आप मुझे भी उन्हीं पापियोंके समान समझकर मेरा भी उद्धार करेंगे? ॥१॥ अनेक योनियोंमें जन्म ले लेकर मैंने नाना प्रकारके दुष्ट कर्म किये हैं। आप मेरे नीच आचरणोंकी बात तो हृदयमें न लायँगे ? हे दीनोंका हित करनेवाले ! क्या आप किसीसे भी न जीते जाने, सबके मनकी बात जानने, सब कुछ करनेमें समर्थ होने और शरणागतोंकी रक्षा करने आदि अपने गुणोंका कोमल खभावसे अनुसरण करेंगे (अर्थात् अपने इन गुणोंकी ओर देखकर, मेरे पापोंसे विनाकर, मेरे मनकी बात जानकर अपनी सर्वशक्तिमत्तासे मुझ शरणमें पड़े हुएका उद्धार करेंगे) ॥२॥ मेरे हृदयमें अज्ञान, अहंकार, मान,