पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३५१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका मुझपर कब होगी ! ॥१॥(दैवी सम्पदाके ) सदगुग, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति आदि सुन्दर साधनोंके समूह कलियुगको देखते ही व्याकुल होकर भाग गये । रह गये पापों और दुर्गुणों के समूह ॥ २॥ बड़े-बड़े अन्यायों और अनाचारोंसे पृथ्वी सूर्यसे भी अधिक गरम हो गयी है । यहाँ सिवा जलनेके शान्तिका कोई साधन ही नहीं रहा। अब मैं कहाँ जाऊँ ? मैं आपकी वलैया ले रहा हूँ। मुझे और कहीं ठौर-ठिकाना नहीं है । मेरी बुद्धि बड़ी ही व्याकुल हो रही है।॥ ३॥ हे बायजी ! इस अपनी देहके सहित कोई भी अपना नहीं है (किसका सहारा लू)। सभी कठोर दुराचारी दिखायी देते हैं । हे 'धनश्याम ! यह तुलसीरूपी फूली-फली धानकी खेती मूखी जा रही है, अब भी मेघ बनकर (कृपा-जलकी वर्षासे) इसे सींच दीजिये ॥४॥ [२२२] बलि जाउँ, और कासो कहौं ? सदगुनसिंधु स्वामि सेवक हित कहुँ न कृपानिधि-सोलहौं ॥१॥ जाहजहँ लोभ लोल लालचबस निजहितचित चाहनि चहीं। तर तहतरनितकत उलूकज्यों भटकिकुतरु-कोटर गहीं॥२॥ काल-सुभाउ-करम विचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहीं। मोको तौसकल सदा एकहि रसदुसह दाह दारुन दहौं ॥३॥ उचित अनाथ होइ दुखभाजन भयो नाथ! किंकर न हो। अब रावरो कहाइन चूझिये, सरनपाल! सॉसति सही। हाल | राजीवबिलोचन ! मगन-पाप-संताप हो। लसीप्रभु!जबतव जेहि तेहि बिधि रामनिबाहे निरचाही भावार्थ-प्रभो! बलिहारी। (मैं अपने दु.ख) और किसे सना