पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३८०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३८५ विनय-पत्रिका (उसमें पड़ते ही सब ओरसे मलिनता छा जायगी) फिर भी चित्त- को उसीमें सानकर (प्यास बुझानेके लिये) मैं कुटिल मलसे ही मलको धोया चाहता हूँ। प्यास लग रही है पर मैं ऐसा दुष्ट हूँ कि श्रीगङ्गाजीको छोडकर बार-बार व्याकुल हो आकाश निचोड़ता फिरता हूँ (सच्चे सुखकी प्राप्तिके लिये दुःखरूप विषयोंमें भटकता हूँ) ॥३॥ हे नाथ ! मैने अपना एक भी दोष आपसे नहीं छिपाया है, अतः अब इस तुलसीदासपर कृपा कीजिये। मुझे बिछौना बिछाते- बिछाते ही सारी रात बीत गयी, पर हे नाथ ! कभी नींदभर नहीं सोया । ( सुख-प्राप्तिके उपाय करते-करते ही जीवन बीत गया, आपको प्राप्त कर पूर्णकाम हो बोधरूप सुखकी नींदमें कभी नहीं सो पाया । अब तो कृपा कीजिये)॥ ४ ॥ [२४६] . लोक-वेद हूँ विदित वात सुनि-समुझि मोह- मोहित विकल मति थिति न लहति । छोटे-बड़े, खोटे-खरे, मोटेऊ दूवरे, राम ! रावरे निवाहे सवहीकी निवहति ॥१॥ होती जो आपने वस, रहती एक ही रस, । दूनी न हरष-सोक-सॉसति सहति । चहतो जो जोई जोई, लहतो लो सोई सोई, केहू भॉति काहूकी न लालसा रहति ॥२॥ करम, काल, सुभाउ गुन-दोष जीव जग मायाते, सो सभै भौंह चकित चहति । ईसनि-दिगीसनि, जोगीसनि, मुनीसनि हू, छोड़ति छोझये ते, गहाये ते गहति ॥ ३॥ वि०प० २५-