पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३८२

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विनय-पत्रिका तुलसीदास कहते हैं कि हे प्रभो । इस बाजीकी हार-जीत आपहीके हाथमें है! यह वात सरखतीने अनेक वेप धारण कर बहुत-से मुखोंसे कही है (सभी विद्वानोंकी वाणीसे यही निकला है कि बन्धन-मोक्ष सब श्रीभगवान्के ही हाथ है )॥ ४ ॥ [२४७] राम जपु जीह ! जानि, प्रीति सो प्रतीत मानि, रामनाम जपे जैहै जियकी जरनि । रामनामसो रहनि, रामनामकी कहनि, कुटिल कलि-मल-सोक-संकट-हरनि ॥१॥ रामनामको प्रभाउ पूजियत गनराउ, कियो न दुराउ, कही आपनी करनि । भव-सागरको सेतु, कासीहू सुगति हेतु, जपत सादर संभु सहित घरनि ॥२॥ वालमीकि ब्याध हे अगाध-अपराध-निधि) 'मरा' 'मरा' जपे पूजे मुनि अमरनि । रोक्यो विध्य, सोख्यो सिंधु घटजहुँ नाम-बल, __ हारयो हिय, खारो भयो भूसुर-डरनि ॥३॥ नाम-महिमा अपार, सेष-सुक बार-बार मति अनुसार बुध बेदहू बरनि । नामरति-कामधेनु तुलसीको कामतरु, रामनाम है विमोह-तिमिर-तरनि ॥४॥ भावार्थ-हे जीभ! राम-नामका जप कर, राम-नामके (तत्त्वको) जान और प्रेमपूर्वक उसमें विश्वास कर । एक राम-नामके जपसे तेरे