पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४१

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४२ "विनय-पत्रिका सुचि अवनि सुहावनिआलबाला कानन विचित्र,वारी विसाल॥२॥ -मंदाकिनि-मालिनि सदासींच। वरवारिविषमनर-नारिनीच॥३॥ साखा सुसंग, भूरुह-सुपात । निरझरमधुवर,मृदुमलय वाता। सुक,पिक,मधुकर,मुनिबर विहारासाधन प्रसून फल चारि चारु।५। भव-घोरघाम-हर सुखद छाँह ।थप्योथिरप्रभावजानकी नाह॥६॥ साधक-सुपथिक बड़े भाग पाइ। पावत अनेक अभिमत अघाइ ॥७॥ रसएक रहित-गुन करम काल।सियराम लखन पालककृपाला तुलसीजोरामपद चहिय प्रेमासेइय गिरिकरिनिरुपाधि नेम ॥९॥ भावार्थ-चित्रकूट सब तरहके शोकोंसे छुड़ानेवाला है । यह कलियुगका नाश करनेवाला और कल्याण करनेवाला हरा-भरा वृक्ष है॥१॥ पवित्र भूमि इस वृक्षके लिये सुन्दर थाल्हा और विचित्र वन ही इसकी बड़ी भारी वाड है॥२॥ मन्दाकिनीरूपी मालिन इसे अपने उस उत्तम जलसे सदा सींचती है, जिसमें दुष्ट और नीच स्त्री-पुरुषों के नित्य म्नान करनेसे भी उसपर कोई बुरा असर नहीं पड़ता ॥३॥ यहाँके सुन्दर शिखर ही इसकी शाखाएँ और वृक्ष सुन्दर पत्ते हैं । झरने मधुर मकरन्द हैं और चन्दनकी सुगन्धसे मिली हुई पवन ही इसकी कोमलता है ॥ ४॥ यहाँ विहार करनेवाले श्रेष्ठ मुनिगण ही इस वृक्षमें रमनेवाले तोते, कोयल और भौरे हैं। उनके नाना प्रकारके साधन इसके फूल हैं और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष-येही चार सुन्दर फल हैं ॥५॥ इस वृक्षकी छाया ससारकी जन्म-मृत्युरूप कडी धूपका नाश कर सुन्दर सुख देती है, जानकीनाय श्रीरामने इसके प्रभावको सदाके लिये स्थिर कर दिया है॥६ा माधकरूपी श्रेष्ठ पथिकबडे सौभाग्यसे इस वृक्षको पाकर, इससे अनेक प्रकारके मनोगाञ्छित सुख प्राप्त करके तृप्त हो जाते हैं ।। ७॥