पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४१२

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४१७ विनय-पत्रिका समान ( निष्फल ) है ।। ३ ।। जो आदिमे, मध्यमें और अन्तमे भले हैं और सभीका सदा कल्याण करते हैं तथा जिनका यश लोक और वेदमे सर्वत्र फैल रहा है ऐसे श्रीसीतानाथ रामचन्द्रजीके समान शीलनिधान स्वामी दूसरा और कोई नहीं है। अरे दुष्ट ! तू उसे मूला-सा बैठा है, फिर तुझे कैसे कल पड़ रहा है ।। ४ ।। अरे! जो जीवका जीवन, प्राणोंका परम हितू, अत्यन्त प्रिय और नीचोंको पवित्र करनेवाला है, तू उसका निरादर कर रहा है। तुलसी ! कोसलपति कृपालु श्रीरामजीने तेरे लिये चित्रकूटमें जो लीला रची थी, (घोड़ोंपर सवार दो सुन्दर राजपूत वीरोंके वेषमें साक्षात् दर्शन दिये थे ) उसे चित्तमें स्मरण कर ॥ ५॥ [२६५] तन सुचि, मन रुचि, मुख कहाँ 'जन हों सिय-पीको।' केहि अभाग जान्यो नहीं, जोन होइ नाथ सो नातो नेह न नीको॥ जल चाहत पावक लहो, विष होत अमीको। कलिं-कुचाल संतनि कही सोइ सही, मोहि कछु फहम न तरनि तमीको ॥२॥ जानि अंध अंजन कहै वन-बाधिनी-धीको। सुनि उपचार बिकारको सुबिचार करौं जव, तव बुधि बल हरै हीको ॥३॥ प्रभु सो कहत सकुचात हो, परौं जनि फिरि फीको। निकट बोलि, बलि, वरजिये, परिहरै ख्याल अब तुलसिदास जड़ जीको॥४॥ भावार्थ-हे प्रभो ! मै शरीरको पवित्र रखता हूँ, मनमे भी वि०प०२७--