पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४१८

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४२३ विनय-पत्रिका आँसुओंकी धारा बहने लगेगी तभी तुलसीदासको यह विश्वास होगा कि वह श्रीरामजीका हो गया। तब उस ( अनन्य )प्रेमको देखकर हृदयमें आनन्द उमड़कर भर जायगा । (हे प्रभो ! शीघ्र ही अपना- कर मेरी ऐसी दशा कर दीजिये) ॥ ४॥ [२६९] राम कबहुँ प्रिय लागिही जैसे नीर मीनको? सुख जीवन ज्यों जीवको, मनि ज्यों फनिको हित, ज्यो धन लोभ-लीनको ॥१॥ __ज्यों सुभाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीनको। न्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर ! पावन प्रेम पीनको ॥२॥ मनसाको दाता कहे श्रुति प्रभु प्रवीन को। तुलसिदासको भावतो, बलि जाउँ दयानिधि ! दीजै दान दीनको ॥३॥ । भावार्थ-हे श्रीरामजी ! मुझे क्या कभी आप ऐसे प्यारे लगेंगे जैसा मछलीको जल प्यारा लगता है, जीवको सुखमय जीवन प्यारा लगता है, साँपको मणि प्रिय लगती है और अत्यन्त लेभीको धन प्यारा लगता है ॥ १॥ अथवा जैसे नवयुवक नायकको स्वभावसे ही नवयुवती चतुरा नायिका प्यारी लगती है, वैसे ही हे करुगाकी खानि ! मेरे मनमे केवल आपके प्रति पवित्र और अनन्य प्रेमकी ही एक लालसा उत्पन्न कर दीजिये ॥ २॥ वेद कहते हैं कि प्रभु मनमानी वस्तु देनेवाले हैं और बड़े ही चतुर हैं ( बिना ही कहे मनकी बात जानकर उसे पूरी कर देते हैं )। हे दयानिधे ! मैं आपको बलैया लेना हूँ, इस दीन तुलसीदासको भी उसकी मनचाही वस्तुका दान दे दीजिये ।। ३ ॥