पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४३०

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me- विनय-पत्रिका कर देंगे तो इसको भगवान्की शरण मिल जायगी, आपको पुण्य होगा और सुन्दर यश फैलेगा, आपके स्वामी आपपर कृपा करेंगे ( क्योंकि वह दीनोंपर दया करनेवालोंपर स्वाभाविक ही प्रसन्न हुआ करते हैं। आपके स्वार्थ और परमार्थ दोनों वन जायगे ॥२॥ इसलिये अवसर देखकर ( मौका पाते ही) इस पतित तुलसीकी बात सुधार देना। शरणागतवत्सल कृपालु रघुनाथजीसे मुझ पराधीनके प्रेमकी रीतिकी हदको समझकर कह देना ॥ ३ ॥ [२७९] मारुति-मन, रुचि भरतकी लखि लपन कही है। कलिकालहु नाथ ! नाम सों परतीति-प्रीति एक किंकरकी निवही है ॥१॥ सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है। कृपा गरीव निवाजकी, देखत गरीबको साहव वॉह गहीहै॥२॥ विहसि राम कह्यो सत्य है, सुधि मैं हूँ लही है। मुदित माथ नावत, वनी तुलसी अनाथकी, रघुनाथ परी -सही है ॥३॥ रघुनाथहाथ प्रसंग-भगवान् श्रीरामका दिव्य दरबार लगा है, प्रभु जगजननी श्रीजानकीजीके सहितअलौकिक रत्नजटित राज्यसिंहासनपर विराजमान हैं। हनुमान्जी प्रेममग्न हुए नायकी ओर अनन्यदृष्टिसे निहारते हुए चरण दवा रहे हैं। भरतजी, लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी अपने- अपने अधिकारानुसार सेवामे संलग्न हैं। उसी समय तुलसीदासजीकी