पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४४

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- विनय-पत्रिका हनुमत्-स्तुति राग धनाश्री [२५] जयत्यंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत विधुविबुध-कुल-कैरेवानन्दकारी। केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद,लोकगन-शोक-संतापहारी॥१॥ जयति जय बालकपिकेलि-कौतुक उदित चंडकर-मण्डल ग्रासकर्ता राहु-रवि-शक-पवि-गर्व-खर्वीकरण शरण-भयहरण जय भुवन- भर्ती ॥२॥ जयतिरणधीर, रघुवीरहित, देवमणि, रुद्र-अवतार,संसार-पाता। विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपुष, विमलगुण, वुद्धि-चारिधि- विधाता ॥ ३॥ जयति सुग्रीव-ऋक्षादि-रक्षण-निपुण,बालि-बलशालि-बध-मुख्यहेतू जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात- केतू ॥४॥ जयति भूनन्दिनी-शोच-मोचन विपिन-दलन घननादवश विगतशंका लूमलीलाऽनलज्वालमालाकुलित,होलिकाकरणलंकेश-लंका ॥५॥ जयतिसौमित्रि-रघुनन्दनानंदकर,ऋक्ष-कपि-कटक-संघट-विधायी बद्ध-वारिधि-सेतु,अमर-मंगल-हेतुर्भानुकुलकेतु-रण-विजयदायी। जयति जय 'वज्रतनुदशन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरु- शैल-पानी। समर-तैलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर,पेरिडारेसुभटालिघानी। जयति दशकंठघटकर्ण-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हता। अघटघटना-सुघठ-सुघट-विघटन विकट, भूमि-पाताल-जल-गगन- गंता ॥ ८॥