पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४३

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- विनय-पत्रिका चित्रकूटमें श्रीरामजीके चरणोंमे चिहित भूमिका और उनके विहारक स्थान वनका दर्शन कर । वहाँ कपट, पाखण्ड और दम्भके दल ( समूह ) का नाश करनेवाले पर्वतके उन शिखरोंको देख, जो जन्म मरणरूप ससारसे छुटकारा मिलनेके कारण है ॥ २॥ जहाँपर जगत्पिता जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिवने सती अनसूयक पुत्ररूपसे प्रपञ्च और छल छोड़कर जन्म लिया है । जिस चित्रकूट रूपी आश्रममें एक बार प्रवेश करते ही जूएमें हारकर वन-वन भटकते हुए युधिष्ठिर आदि पाण्डव और राजा नलका सारा दुःख दूर हो गया ॥ ३ ॥ वहाँ जानेमें अब देर न कर, अपनी अच्छा बुद्धिसे यह तो विचार कर कि जितने वर्ष बीत गये सो तो गया अब आयुके जितने पल बाकी हैं, वे बीते हुए वर्षोंके समान है। एक-एक पलको एक-एक वर्षके समान बहुमूल्य समझकर समीप जानकर, जल्दी चित्रकूट जाकर श्रीराम-मन्त्रका कर, जिसे जपनेसे श्रीशिवजी कालकूट विष पीनेपर भी अजर, मा हा गय ।। ४॥ जब तू वहाँ निरन्तर श्रीराम-नामजपरूपी सर्वश्रठ यज्ञ और पयखिनी नदीके पवित्र जलमें स्नान तथा उसके जलका पान करता रहेगा, तब श्रीरामजी तेरी मनःकामना पूरी कर और इस सुखमय साधनसे सहजहीमें तुझे धर्म, अर्थ, काम, मार ये चारों फल दे देंगे ॥ ५॥ चित्रकटमें जो कामतानाथ पर्वत है। वही मनोरथ पूर्ण करनेवाली चिन्तामणि और कल्पवृक्ष है, जा युग पृथ्वीपर जगमगाता है । यों तो चित्रकूट सभीके लिये सुखदा है, परन्तु हे तुलसीदास ! तुझे तो विशेषरूपसे उसीके विर प्रेम और वलपर निर्भर रहना चाहिये ॥६॥