पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४६४

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लेने की जर वह बिलखती मणजीने शूर्पणखा मरनेमें ही परिशिष्ट २२५-मृग- ' मारीच रावणका मामा था । इसीको श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रकी यज्ञ-रक्षाके समय एक ही वाणमें सौ योजन दूर समुद्र-पार भेज दिया था। जब पञ्चवटीमें लक्ष्मणजीने शूर्पणखाके नाक और कान काट लिये और वह बिलखती हुई रावणके पास गयी तो रावणने बदला लनेकी इच्छासे मारीचके पास जाकर उसे मायामृग बनने और श्रीरामचन्द्रको धोखा देनेके लिये कहा । पहले तो मारीचने उसे बहुतेरा समझाया और श्रीरामचन्द्रजीसे मेल कर लेनेके लिये कहा, तु जब रावण उसे मारनेके लिये तैयार हो गया तो उसने रावणके हाथसे मरनेकी अपेक्षा श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मरनेमें ही अपना श्रेय समझा। वह मायामृग बनकर पञ्चवटीमे भगवान्की पर्णकुटीके सामने होकर निकला। श्रीजानकीजीने भगवान्से उस मृगको मारकर उसका मृगछाला लानेके लिये कहा। भगवान् उसके पीछे चले और मृगके मरण-समयके आर्तनादको सुनकर श्रीजानकीजीकी आज्ञासे लक्ष्मणजी भी उधर ही निकल पडे । एकान्त देखकर रावण आया और पर्णकुटीसे श्रीसीताजीको रथपर बैठाकर लङ्का ले गया। मारीचको मारकर भगवान्ने उसे सद्गति प्रदान की। २२६-नहि कुंजरो नरो- - महाभारतके युद्धमे कौरवोंकी ओरसे लडते हुए द्रोणाचार्य जब 'पाण्डवोकी सेनाका संहार करने लगे तब श्रीकृष्णभगवान्ने अर्जुनसे कहा कि अब तो द्रोणाचार्यका वध किये बिना काम नहीं चल • सकता । परन्तु अर्जनको गुरुवध करनेकी हिम्मत नहीं हुई। तब नकर पच कर निकला