पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/७८

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विनय-पत्रिका धारण किये और कानोंमें मकराकृत कुण्डल पहने हैं, जिनके भालपर तिलककी सुन्दर झलक है और चन्द्रमाके समान जिनका मुखमण्डल शोभित हो रहा है, जो पीताम्बर, दिव्य आभूषण और यज्ञोपवीत धारण किये हुए हैं। ऐसा कौन है जो श्रीरामके इस नयनाभिराम- रूपका ध्यान करके कल्याणका भागी न हुआ हो॥५|| श्रीरामचन्द्रजी- की जय हो-जो भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नसे सेवित तथा सुग्रीव, सुमन्त आदि मन्त्रियों और भक्तोंको सुख एवं सम्पूर्ण इच्छित पदार्थ देनेवाले हैं, जो अधम, आर्त, दीन, पतित और महापापियोंको केवल एक बार प्रणाम करने और 'मेरी रक्षा करो' इतना कहनेपर ही जन्म-मरणरूप संसारसे वचा लेते हैं॥६॥ महाराज श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो-जिनका पवित्र यश चौदहों भुवनोंमें जगमगा रहा है, जो सर्वया पुण्यमय और धन्य हैं, जिनकी कथारूपी गङ्गा आदिकवि महर्षि श्रीवाल्मीकिरूपी हिमालय पर्वतसे निकली है, जिसमें स्नान कर और जिसके जलका पानकर अर्थात् जिसका श्रवण-मननकर सत-समाज सदा प्रसन्न रहता है ॥७॥ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो- जिनके प्रसिद्ध रामराज्यमें सभी स्त्री-पुरुष अपने-अपने वर्णाश्रम-विहित आचारपर चलनेवाले, सत्य, शम, दम, दया और दानरूपी व्रतोंका पालन करनेवाले, दुःखों और दोषोंसे रहित, सदा सन्तोपी, सब प्रकारसे सुखी और रामकी राज्यलीलाको सदा गाया और सुना करते थे अर्थात् वे निश्चिन्त होकर सदा रामकी लीलाको ही गाते-सुनते थे ॥८॥ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो-जो वैराग्य और ज्ञान-विज्ञानके समुद्र हैं । जो प्रणाम करनेवालोंको सुख देते और उनके सारे पाप- तापोंको हर लेते हैं। हे जानकीनाथ ! हे संशयका नाश करनेवाले !