पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/८०

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विनय-पत्रिका निर्मल चन्द्रमाके समान, दशरथनन्दन श्रीरामका भजन कर ॥३॥ जिनके मस्तकार रत्नजडित मुकुट, कानोंमें कुण्डल, भालपर सुन्दर तिलक और प्रत्येक अङ्गमें सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं। जिनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी हैं, जो धनुष-बाण लिये हुए हैं। जिन्होंने संग्राममें खर-दूषणको जीत लिया है ॥ ४॥ जो शिव, शेष और मुनियोंके मनको प्रसन्न करनेवाले और काम-कोर-लोभादि शत्रुओंका नाश करनेवाले हैं। तुलसीदास प्रार्थना करता है कि वे श्रीरघुनायजी मेरे हृदय-कमलमें सदा निवास करें ॥५॥ राग रामकली [४६] राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढ़ मन, चार वारं। 'सकल सौभाग्य-सुख-नानि जिय जानि शठ, मानि विश्वास वद वेदसारं ॥१॥ कोशलेन्द्र नव-नीलकंजामतनु, मदन-रिपु-कंजहृदि-चंचरीक । जानकीरवन सुखभवन भुवनैकप्रभुसमर-भंजन,परम कारुनीकं॥ दनुज-चन-धूमधुज, पीन आजानुभुज, दंड-कोदंडवरचंड वानं । अरुनकर चरण मुख नयन राजीव, गुन-अयन, बहु मयन-शोभा- निधानं ॥३॥ वासनाद-कैरव-दिवाकर, काम-क्रोध-मद-कंज-कानन-तुषारं । लोभ अति मत्त नागेंद्र पंचाननं भकहित हरण संसार-भारं ॥४॥ कशव, क्लेशहं केश-चंदित पद-द्वंद्व मंदाकिनी-मूलभूतं । वि० ५० ६--