पृष्ठ:सप्तसरोज.djvu/४३

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पंच परमेश्वर

जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझेमें खेती होती थी। कुछ लेन-देनमें भी साझा था। एकको दूसरेपर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गये थे तब अपना घर अलगू को सौंप गये थे और अलगू जब कभी बाहर जाते, तब जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खान-पान का व्यवहार था, न धर्मका नाता, केवल विचार मिलते थे। मित्रताका मूलमन्त्र भी यही है।

इस मित्रताका जन्म उसी समय हुआ जब दोनों मित्र बालक ही थे और जुम्मन के पूज्य पिता जुमराती उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। अलगूने गुरुजीकी बहुत सेवा की—खूब रिकाबियाँ माँजी, खूब प्याले धोये। उनका हुक्का एक क्षण के लिये भी विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येक चिलम अलगूको आध घण्टे तक किताबों से मुक्त कर देती थी। अलगू के पिता पुराने विचारोंके मनुष्य थे। शिक्षा की अपेक्षा उन्हें गुरुकी सेवा-शुश्रूषापर अधिक विश्वास था। कहते थे कि विद्या पढ़नेसे नहीं आती, जो कुछ होता है गुरुके आशीर्वाद से होता है। बस, गुरुजीकी कृपा दृष्टि चाहिये। अतएव यदि अलगूपर जुमराती शेख के आशीर्वाद अथवा सत्संग